बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
Page 870 of 1402
Read in context८५६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते हस्त्यृषभँ सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥ ७ ॥
[ याज्ञवल्क्य-] 'तुमसे किसी आचार्यने जो भी कहा है वह हम सुनें।' [ जनक- ] 'मुझसे विदग्ध शाकल्यने कहा है कि हृदय ही ब्रह्म है।' [याज्ञवल्क्य-] 'जिस प्रकार मातृमान्, पितृमान्, आचार्यवान् पुरुष उपदेश करे, उसी प्रकार उस शाकल्यने 'हृदय ही ब्रह्म है' ऐसा कहा है, क्योंकि हृदयहीनको क्या मिल सकता है ? किंतु क्या उसने तुम्हें उसके आयतन और प्रतिष्ठा भी बतलाये हैं ?' [ जनक- ] 'मुझे नहीं बतलाये।' [याज्ञवल्क्य-] 'हे सम्राट् ! यह तो एक पादवाला ही ब्रह्म है।' [जनक-] 'याज्ञवल्क्य ! वह हमें आप बतलाइये।' [ याज्ञवल्क्य-] 'हृदय ही आयतन है, आकाश प्रतिष्ठा है तथा इसकी 'स्थिति' इस रूपसे उपासना करे।' [जनक-] 'याज्ञवल्क्य ! स्थितती क्या है ?' 'हे सम्राट् ! हृदय ही स्थितता है' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, 'राजन् ! हृदय ही समस्त भूतोंका आयतन है, हृदय ही सब भूतोंकी प्रतिष्ठा है और हृदयमें ही समस्त भूत प्रतिष्ठित होते हैं। हे सम्राट् ! हृदय ही परम ब्रह्म है। जो विद्वान् इसकी इस प्रकार उपासना करता है, उसका हृदय त्याग नहीं करता, सब भूत उसको उपहार समर्पण करते हैं और वह देव होकर देवोंको प्राप्त होता है।' वैदेह जनकने कहा, 'मैं आपको हाथीके समान हृष्ट-पुष्ट बैल उत्पन्न करनेवाली एक हजार गौएँ देता हूँ। उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'मेरे पिताका विचार था कि शिष्यको उपदेशके द्वारा कृतार्थ किये बिना उसका धन नहीं ले जाना चाहिये' ॥ ७ ॥
| विदग्धः शाकल्यो हृदयं वै ब्रह्मेति। हृदयं वै सम्राट् सर्वेषां भूतानाम् आयतनम् । नाम- | विदग्ध शाकल्यने 'हृदय ही ब्रह्म है' ऐसा कहा है। हे सम्राट् ! हृदय ही समस्त भूतोंका आयतन है। |