बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
Page 704 of 1402
Read in context| ६९४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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पारिक्षितोंकी गतिका वर्णन
स होवाचोवाच वै सोऽगच्छन् वै ते तद्यत्राश्वमेधयाजिनो गच्छन्तीति क्व न्वश्वमेधयाजिनो गच्छन्तीति द्वात्रिँशतं वै देवरथाह्न्यान्त्ययं लोकस्तँ समन्तं पृथिवी द्विस्तावत् पर्येति ताँ समन्तं पृथिवी द्विस्तावत् समुद्रः पर्येति तद्यावती क्षुरस्य धारा यावद्वा मक्षिकायाः पत्रं तावानन्तरेणाकाशस्तानिन्द्रः सुपर्णो भूत्वा वायवे प्रायच्छत्तान् वायुरात्मनि धित्वा तत्रागमयद्यत्राश्वमेधयाजिनोऽभवन्नित्येवमिव वै स वायुमेव प्रशशँस तस्माद्वायुरेव व्यष्टिर्वायुः समष्टिरप पुनर्मृत्युं जयति य एवं वेद ततो ह भुज्युर्लाह्यायनिरुपरराम ॥ २ ॥
उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'उस गन्धर्वने निश्चय यह कहा था कि वे वहाँ चले गये, जहाँ अश्वमेध यज्ञ करनेवाले जाते हैं।' [भुज्यु] 'अच्छा तो, अश्वमेधयाजी कहाँ जाते हैं?' [ याज्ञवल्क्य-] 'यह लोक बत्तीस देवरथाह्न्य है। उसे चारों ओरसे दूनी पृथिवी घेरे हुए है। उस पृथिवीको सब ओरसे दूना समुद्र घेरे हुए है। सो जितनी पतली छुरेकी धार होती है, अथवा जितना सूक्ष्म मक्खीका पंख होता है, उतना उन अण्डकपालोंके मध्यमें आकाश है। इन्द्र (चित्य अग्नि) ने पक्षी होकर उन पारिक्षितोंको वायुको दिया। उन्हें वायु अपने स्वरूपमें स्थापित कर वहाँ ले गया, जहाँ अश्वमेधयाजी रहते हैं; इस प्रकार उस गन्धर्वने वायुकी ही प्रशंसा की थी। अतः वायु ही व्यष्टि है और वायु ही समष्टि है। जो ऐसा जानता है, वह पुनर्मृत्युको जीत लेता है।' तब लाह्यायनि भुज्यु चुप हो गया ॥ २॥
| संस्कृत | हिन्दी |
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| स होवाच याज्ञवल्क्यः, उवाच<br><br>वै सः—वैशब्दः स्मरणार्थः—<br><br>उवाच वै स गन्धर्वस्तुभ्यम् । | उस याज्ञवल्क्यने कहा—'उसने निश्चय यही कहा था'—यहाँ 'वै' शब्द स्मरणके लिये है—उस गन्धर्वने निश्चय तुमसे यही कहा था कि वे |