बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
Page 635 of 1402
Read in contextब्राह्मण १]
शाङ्करभाष्यार्थ
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| ब्रह्मिष्ठप्रतिज्ञं सन्तं तत एव<br>ब्रह्मिष्ठपणस्वीकरणात् प्रष्टुं दध्रे<br>धृतवान् मनो होता अश्वलः॥२॥ | वाले हैं।' इस प्रकार ब्रह्मिष्ठकी<br>प्रतिज्ञावाला होनेपर और इसी<br>कारण ब्रह्मिष्ठपण स्वीकार करनेसे<br>होता अश्वलने मनमें उससे प्रश्न<br>करनेका निश्चय कर लिया ॥२॥ |
मृत्युग्रस्त कर्मसाधनोंकी आसक्तिसे पार पानेका उपाय
याज्ञवल्क्येति होवाच यदिदँ सर्वं मृत्युनाप्तँ सर्वं मृत्युनाभिपन्नं केन यजमानो मृत्योराप्तिमतिमुच्यत इति होत्रर्त्विजाग्निना वाचा वाग्वै यज्ञस्य होता तद्येयं वाक्सोऽयमग्निः स होता स मुक्तिः सातिमुक्तिः ॥३॥
'हे याज्ञवल्क्य !' ऐसा अश्वलने कहा, 'यह सब जो मृत्युसे व्याप्त है, मृत्युद्वारा स्वाधीन किया हुआ है, उस मृत्युकी व्याप्तिका यजमान किस साधनसे अतिक्रमण करता है?' [इसपर याज्ञवल्क्यने कहा—] 'वह यजमान होता ऋत्विकरूप अग्निसे और वाक्द्वारा उसका अतिक्रमण कर सकता है। वाक् ही यज्ञका होता है यह जो वाक् है, वही यह अग्नि है, वह होता है, वह मुक्ति है और वही अतिमुक्ति है' ॥ ३ ॥
| याज्ञवल्क्येति होवाच । तत्र मधुकाण्डे पाङ्क्तेन कर्मणा दर्शनसमुच्चितेन यजमानस्य मृत्योरत्ययो व्याख्यात उद्गीथप्रकरणे सङ्क्षेपतः। तस्यैव परीक्षाविषयोऽयमिति तद्गतदर्शनविशेषार्थोऽयं विस्तर आरभ्यते । | 'हे याज्ञवल्क्य !' ऐसा अश्वलने कहा। तहाँ गत मधुकाण्डमें जो उद्गीथप्रकरण है, उसमें दर्शनसहित पाङ्क्तकर्मसे यजमानके मृत्युसे पार होनेका संक्षेपसे वर्णन किया गया है। यह प्रकरण उसीकी परीक्षाका विषय [अर्थात् उसीका विचार करनेके लिये] है, अतः उसमें आये हुए दर्शनविशेषके लिये ही यह विस्तार आरम्भ किया जाता है। |
बृ० उ० ४०—