बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
DevanagariSanskritpublished1,402 pages
Page 633 of 1402
Read in contextPage 633
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६२३
याज्ञवल्क्यने अपने ही ब्रह्मचारीसे कहा, 'हे सोम्य सामश्रवा ! तू इन्हें ले जा।' तब वह उन्हें ले चला। इससे वे ब्राह्मण 'यह हम सबमें अपनेको ब्रह्मिष्ठ कैसे कहता है' इस प्रकार कहते हुए क्रुद्ध हो गये। विदेहराज जनकका होता अश्वल था, उसने इससे पूछा, 'याज्ञवल्क्य ! हम सबमें क्या तुम ही ब्रह्मिष्ठ हो ?' उसने कहा, ब्रह्मिष्ठको तो हम नमस्कार करते हैं, हम तो गौओंकी ही इच्छावाले हैं।' इसीसे होता अश्वलने उससे प्रश्न करनेका निश्चय किया ॥ २ ॥
| गा एवमवरुध्य ब्राह्मणांस्तान् होवाच हे ब्राह्मणा भगवन्त इत्यामन्त्र्य । यो वो युष्माकं ब्रह्मिष्ठः, सर्वे यूयं ब्रह्माणोऽतिशयेन युष्माकं ब्रह्मा यः स एता गा उदजतामुत्कालयतु स्वगृहं प्रति । | इस प्रकार गौओंको रोककर उसने उन ब्राह्मणोंसे 'हे पूज्य ब्राह्मणो !' इस प्रकार सम्बोधित करके कहा, 'आपमें जो ब्रह्मिष्ठ हो—ब्रह्मा (ब्रह्मवेत्ता) तो आप सभी हैं, किंतु जो आपमें अतिशयरूपसे ब्रह्मा हो—वह इन गौओंको अपने घरके प्रति हाँक ले जाय।' |
| ते ह ब्राह्मणा न दधृषुः । ह किलैवमुक्ता ब्राह्मणा ब्रह्मिष्ठतामात्मनः प्रतिज्ञातुं न दधृषुर्न प्रगल्भाः संवृत्ताः । अप्रगल्भभूतेषु ब्राह्मणेष्वथ ह याज्ञवल्क्यः स्वमात्मीयमेव ब्रह्मचारिणमन्तेवासिनमुवाच— | उन ब्राह्मणोंका साहस न हुआ। इस प्रकार कहे जानेपर उन ब्राह्मणोंका अपनी ब्रह्मिष्ठताके विषयमें प्रतिज्ञा करनेका साहस न हुआ—वे ऐसा प्रकट करनेकी धृष्टता न कर सके। ब्राह्मणोंके साहसहीन हो जानेपर याज्ञवल्क्यने अपने ही ब्रह्मचारी अनुगत शिष्यसे कहा, |
| एता गा हे सोम्योदजोद्गमयास्मद्गृहान् प्रति, हे सामश्रवः— | 'हे सोम्य ! हे सामश्रवा ! इन गौओंको हमारे घर ले जा; |
| सामविधिं हि शृणोत्यतोऽर्थाच्चतुर्वेदो याज्ञवल्क्यः । | सामविधिको श्रवण करनेके कारण उसे सामश्रवा कहा है, इससे स्वतः ही याज्ञवल्क्य चारों वेदोंका |