बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
Page 618 of 1402
Read in context| ६१० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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इदं वै तन्मधु दध्यङ्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच । तदेतदृषिः पश्यन्नवोचत् । पुरश्चक्रे द्विपदः पुरश्चक्रे चतुष्पदः। पुरः स पक्षी भूत्वा पुरः पुरुष आविशदिति । स वा अयं पुरुषः सर्वासु पूर्षु पुरिशयो नैनेन किञ्चनानावृतं नैनेन किञ्चनासंवृतम् ॥ १८ ॥
उस इस मधुका दध्यङ्ङाथर्वणने अश्विनीकुमारोंको उपदेश किया। इसे देखते हुए ऋषिने कहा—परमात्माने दो पैरोंवाले शरीर बनाये और चार पैरोंवाले शरीर बनाये। पहले वह पुरुष पक्षी होकर शरीरोंमें प्रविष्ट हो गया। वह यह पुरुष समस्त पुरों ( शरीरों ) में पुरिशय है। ऐसा कुछ भी नहीं है, जो पुरुषसे ढका न हो तथा ऐसा भी कुछ नहीं है, जिसमें पुरुषका प्रवेश न हुआ हो—जो पुरुषसे व्याप्त न हो ॥ १८ ॥
| इदं वै तन्मध्विति पूर्ववत् । उक्तौ द्वौ मन्त्रौ प्रवर्ग्यसम्बन्ध्याख्यायिकोपसंहर्तारौ । द्वयोः प्रवर्ग्यकर्मार्थयोरध्याययोरर्थ आख्यायिकाभूताभ्यां मन्त्राभ्यां प्रकाशितः । ब्रह्मविद्यार्थयोस्त्वध्याययोरर्थउत्तराभ्यामृग्भ्यां प्रकाशयितव्यः, इत्यतःप्रवर्तते। यत् कक्ष्यं च मधूक्तवानाथर्वणो युवाभ्यामित्युक्तम् । किं पुनस्तन्मधु ? इत्युच्यते— | ‘इदं वै तन्मधु’ इत्यादि वाक्यका अर्थ पूर्ववत् है। उपर्युक्त दो मन्त्र प्रवर्ग्यसम्बन्धी आख्यायिकाका उपसंहार करनेवाले हैं। प्रवर्ग्यकर्मसम्बन्धी दो अध्यायोंका अर्थ इन उपर्युक्त आख्यायिकाभूत दो मन्त्रोंद्वारा प्रकाशित किया गया है। ब्रह्मविद्यासम्बन्धी दो अध्यायोंका अर्थ आगेकी दो ऋचाओंद्वारा प्रकाशित करना है इसीसे श्रुति प्रवृत्त होती है। आथर्वणने तुम दोनोंसे जो कक्ष्य मधु कहा था—ऐसा ऊपर कहा गया है। वह मधु क्या था ? उसका वर्णन किया जाता है— |