बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
DevanagariSanskritpublished1,402 pages
Page 616 of 1402
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| ६०८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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उस इस मधुका दध्यङ्ङाथर्वणने अश्विनीकुमारोंको उपदेश किया। इसे देखते हुए ऋषि (मन्त्रद्रष्टा) ने कहा है—हे अश्विनीकुमारो! तुम दोनों आथर्वण दध्यङ्के लिये घोड़ेका शिर लाये। उसने सत्यपालन करते हुए तुम्हें त्वाष्ट्र (सूर्यसम्बन्धी) मधुका उपदेश किया तथा हे दस्र (शत्रुहिंसक) जो [आत्मज्ञानसम्बन्धी] कक्ष्य (गोप्य) मधु था [वह भी तुमसे कहा] ॥ १७॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| इदं वै तन्मध्वित्यादि पूर्ववन्मन्त्रान्तरप्रदर्शनार्थम् । तथान्यो मन्त्रस्तामेव आख्यायिकामनुसरति स्म । आथर्वणो दध्यङ् नाम, आथर्वणोऽन्यो विद्यत इत्यतो विशिनष्टि दध्यङ्नामाथर्वणः । | ‘इदं वै तन्मधु’ इत्यादि कथन पूर्ववत् अन्य मन्त्र प्रदर्शित करनेके लिये है। अर्थात् इसी प्रकार दूसरे मन्त्रने भी उसी आख्यायिकाका अनुसरण किया। दध्यङ् नामवाला आथर्वण। आथर्वण तो दूसरा भी है इसलिये ‘दध्यङ्नामक आथर्वण’ ऐसा कहकर इसे विशेषणयुक्त करते हैं। |
| तस्मै दधीच आथर्वणाय हेऽश्विनावेति मन्त्रदृशो वचनम्, अश्व्यमश्वस्य स्वभूतं शिरः, ब्राह्मणस्य शिरसिच्छिन्नेऽश्वस्य शिरश्छित्त्वा ईदृशमतिक्रूरं कर्म कृत्वा अश्व्यं शिरो ब्राह्मणं प्रति ऐरयतं गमितवन्तौ युवाम् । स चाथर्वणो वां युवाभ्यां तन्मधु प्रवोचद् यत् पूर्वं प्रतिज्ञातं वक्ष्यामीति । | हे अश्विनीकुमारो! उस दध्यङ् आथर्वणके लिये—यह मन्त्रद्रष्टा ऋषिका वचन है—तुम अश्व्य—अश्वका स्वभूत शिर अर्थात् ब्राह्मणका शिर काट देनेपर तुम अश्वका शिर काटकर, ऐसा अत्यन्त क्रूर कर्म कर उस अश्वके शिरको तुमने ब्राह्मणके पास ‘ऐरयतम्’—पहुँचाया और उस आथर्वणने तुम्हें उस मधुका उपदेश किया जिसके लिये उसने पहले यह प्रतिज्ञा की थी ‘मैं कहूँगा।’ |
| स किमर्थमेवं जीवितसन्देहमारुह्य प्रवोचत्? इत्युच्यते। ऋता- | उसने इस प्रकार जीवनके संदेहमें पड़कर भी उसका उपदेश क्यों किया, सो बतलाया जाता है— |