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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

Page 603 of 1402

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Page 603
ब्राह्मण ५ ]शाङ्करभाष्यार्थ५९५

| यस्तु परिशिष्टो विज्ञानमयः—<br><br>यदर्थोऽयं देहलिङ्गसङ्घात आत्मा—<br><br>सः ‘यश्चायमात्मा’ इत्युच्यते ॥ १४ ॥ | किया गया। इससे भिन्न जो विज्ञानमय पुरुष रह जाता है, जिसके लिये कि यह देहेन्द्रियसंधात-रूप आत्मा है, वही ‘जो यह आत्मा है’ ऐसा कहकर बतलाया गया है ॥ १४ ॥ |


आत्माका सर्वाधिपतित्व और सर्वाश्रयत्वनिरूपण

स वा अयमात्मा सर्वेषां भूतानामधिपतिः सर्वेषां भूताना ँ राजा तद्यथा रथनाभौ च रथनेमौ चाराः सर्वे समर्पिता एवमेवास्मिन्नात्मनि सर्वाणि भूतानि सर्वे देवाः सर्वे लोकाः सर्वे प्राणाः सर्व एत आत्मानः समर्पिताः ॥ १५ ॥

वह यह आत्मा समस्त भूतोंका अधिपति एवं समस्त भूतोंका राजा है। इस विषयमें दृष्टान्त—जिस प्रकार रथकी नाभि और रथकी नेमिमें सारे अरे समर्पित रहते हैं, इसी प्रकार इस आत्मामें समस्त भूत, समस्त देव, समस्त लोक, समस्त प्राण और ये सभी आत्मा समर्पित हैं ॥ १५ ॥

यस्मिन्नात्मनि परिशिष्टो विज्ञा-<br>नमयोऽन्त्ये पर्याये प्रवेशितः,<br>सोऽयमात्मा। तस्मिन्नविद्याकृत-<br>कार्यकरणसङ्घातोपाधिविशिष्टे ब्रह्म-<br>विद्यया परमात्मनि प्रवेशिते,<br>स एवमुक्तोऽनन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नः<br>प्रज्ञानघनभूतः सर्वेषां भूतानाम-जिसका पहलेके पर्यायोंमें उप-<br>देश नहीं हुआ, उस अवशिष्ट विज्ञान-<br>मयका अन्तिम पर्यायमें जिस<br>आत्मामें प्रवेश कराया गया है,<br>वह यहाँ ‘यह आत्मा’ इस प्रकार<br>कहा गया है। अविद्याकृत देहेन्द्रिय-<br>संघातरूप उपाधिसे युक्त जीवका<br>ब्रह्मविद्याके द्वारा उस परमार्थ<br>आत्मामें प्रवेश कराये जानेपर वह<br>इस प्रकार कहा हुआ आत्मा अर्थात्<br>आत्मभावको प्राप्त हुआ विद्वान्<br>अन्तर-बाह्यशून्य, पूर्ण और प्रज्ञान-<br>घनभूत है; यह समस्त भूतोंका आत्मा