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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

Page 597 of 1402

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Page 597

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ५८९


अयꣳ स्तनयित्नुः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य स्तनयित्नोः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन् स्तनयित्नौ तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मꣳ शाब्दः सौवरस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदꣳ सर्वम् ॥ ९ ॥

यह मेघ समस्त भूतोंका मधु है तथा समस्त भूत इस मेघके मधु हैं। यह जो इस मेघमें तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म शब्द एवं स्वरसम्बन्धी तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे बतलाया गया है ]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है ॥ ९ ॥

| तथा स्तनयित्नुः शब्दे भवः शाब्दोऽध्यात्मं यद्यपि, तथापि स्वरे विशेषतो भवतीति सौवरोऽध्यात्मम् ॥ ९ ॥ | इसी प्रकार मेघ मधु है। शब्दमें रहनेवालेको शाब्द कहते हैं; वह यद्यपि अध्यात्म है, तथापि विशेषरूपसे स्वरमें रहता है, इसलिये सौवर ( स्वरसम्बन्धी ) पुरुष अध्यात्म है ॥ ९ ॥ |


अयमाकाशः सर्वेषां भूतानां मध्वस्याकाशस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्नाकाशे तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मꣳ हृद्याकाशस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदꣳ सर्वम् ॥ १० ॥

यह आकाश समस्त भूतोंका मधु है तथा समस्त भूत इस आकाशके मधु हैं। यह जो इस आकाशमें तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म हृदयाकाशरूप तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे बतलाया गया है ]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है ॥ १० ॥