बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
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Read in contextब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७९
| चाग्नेरिव आत्मा आत्मनो विषयः, न चाविषये ज्ञातुर्ज्ञानमुपपद्यते। तस्माद् येनेदं सर्वं विजानाति तं विज्ञातारं केन करणेन को वान्यो विजानीयात्। <br><br> यदा तु पुनः परमार्थविवेकिनो ब्रह्मविदो विज्ञातैव केवलोऽद्वयो वर्तते तं विज्ञातारमरे केन विजानीयादिति ॥ १४ ॥ | होती [तथा अग्नि जैसे अपनेहीको नहीं जलाता,] उसी प्रकार आत्मा अपना ही विषय नहीं हो सकता। और जो विषय नहीं है, उसका ज्ञाताको ज्ञान नहीं हो सकता। अतः जिसके द्वारा इस सबको जानता है, उस विज्ञाताको कोई अन्य अनात्मा किस करणके द्वारा जान सकता है। किंतु जिस अवस्थामें परमार्थका विवेक रखनेवाले ब्रह्मवेत्ताके लिये केवल अद्वितीय विज्ञाता ही विद्यमान रहता है, उस समय हे मैत्रेयि! उस विज्ञाताको वह किसके द्वारा जानेगा ? ॥ १४ ॥ |
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये द्वितीयाध्याये चतुर्थं मैत्रेयीब्राह्मणम् ॥ ४ ॥
पञ्चम ब्राह्मण
| उपक्रमः<br>यत्केवलं कर्मनिरपेक्षममृतत्वसाधनं तद्वक्तव्यमिति मैत्रेयीब्राह्मणमारब्धम्, तच्चात्मज्ञानं सर्वसंन्यासाङ्गविशिष्टम्। आत्मनि च विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति, आत्मा च प्रियः सर्वस्मात्; | जो कर्मकी अपेक्षासे रहित अकेला ही अमृतत्वका साधन है, उसका वर्णन करना था, इसीसे मैत्रेयी-ब्राह्मण आरम्भ किया गया था और वह सर्वसंन्यासरूप अङ्गसे युक्त आत्मज्ञान ही है। आत्माका ज्ञान होनेपर यह सब कुछ ज्ञात हो जाता है और आत्मा सबसे अधिक प्रिय है |