बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
DevanagariSanskritpublished1,402 pages
Page 579 of 1402
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ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २७१
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
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| विनश्यति; यथा उदकालक्तकादिहेत्वपनये सूर्यचन्द्रस्फटिकादिप्रतिबिम्बो विनश्यति, चन्द्रादिस्वरूपमेव परमार्थतो व्यवतिष्ठते, तद्वत्प्रज्ञानघनमनन्तमपारं स्वच्छं व्यवतिष्ठते। | जिस प्रकार जल और अलक्तक आदि हेतुओंके हट जानेपर सूर्य, चन्द्र और स्फटिक आदिका प्रतिबिम्ब नष्ट हो जाता है, केवल चन्द्रादिका पारमार्थिक स्वरूप ही रह जाता है उसी प्रकार फिर अनन्त, अपार और स्वच्छ प्रज्ञानघन ही रह जाता है। |
| न तत्र प्रेत्य विशेषसंज्ञास्ति कार्यकारणसङ्घातेभ्यो विमुक्तस्य—इत्येवमरे मैत्रेयि ब्रवीमि नास्ति विशेषसंज्ञेति—अहमसावमुष्य पुत्रो ममेदं क्षेत्रं धनं सुखी दुःखीत्येवमादिलक्षणा, अविद्याकृतत्वात्तस्याः, अविद्यायाश्च ब्रह्मविद्यया निरन्वयतो नाशितत्वात्कुतो विशेषसंज्ञासम्भवो ब्रह्मविदश्चैतन्यस्वभावावस्थितस्य? शरीरावस्थितस्यापि विशेषसंज्ञा नोपपद्यते किमुत कार्यकारणविमुक्तस्य सर्वतः? इति होवाचोक्तवान्किल परमार्थदर्शनं मैत्रेय्यै भार्यायै याज्ञवल्क्यः ॥ १२ ॥ | फिर प्रेत्य—देहेन्द्रियभावसे मुक्त होनेपर उसकी विशेष संज्ञा नहीं रहती, इसीसे हे मैत्रेयि! मैं यह कहता हूँ कि उसकी 'मैं अमुक हूँ, अमुकका पुत्र हूँ, यह क्षेत्र और धन मेरा है, मैं सुखी हूँ, दुःखी हूँ' इत्यादि प्रकारकी विशेष संज्ञा नहीं रहती; क्योंकि वह तो अविद्याजनित ही है, और अविद्याका उसके कारणके सहित ब्रह्मविद्यासे नाश हो चुका है, इसलिये चैतन्यस्वरूप ब्रह्मवेत्ताकी विशेषसंज्ञा रहनेकी सम्भावना कहाँ है? उसकी तो शरीरमें रहते हुए भी कोई संज्ञा होनी सम्भव नहीं है, फिर सब प्रकार देह और इन्द्रियोंसे मुक्त होनेपर तो रह ही कैसे सकती है? इस प्रकार याज्ञवल्क्यने अपनी भार्या मैत्रेयीके प्रति परमार्थदृष्टिका निरूपण किया ॥ १२ ॥ |