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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

Page 49 of 1402

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Page 49

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४३


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
आग्नेय्याद्याः पर्शवः पार्श्वस्थीनि ।<br><br>ऋतवोऽङ्गानि संवत्सरावयवत्वादङ्गसाधर्म्यात् । मासाश्चार्धमासाश्च पर्वाणि सन्धयः सन्धिसामान्यात् ।<br><br>अहोरात्राणि प्रतिष्ठाः । बहुवचनात् प्राजापत्यदैवपित्र्यमानुषाणि, प्रतिष्ठाः पादाः प्रतितिष्ठत्येतैरिति । अहोरात्रैर्हि कालात्मा प्रतितिष्ठत्यश्वश्च पादैः ।आग्नेयी आदि अवान्तर दिशाएँ पसलियाँ अर्थात् पार्श्वभागकी अस्थियाँ हैं। ऋतुएँ अङ्ग हैं, क्योंकि संवत्सरके अवयव होनेके कारण अङ्गोंसे उनकी समानता है। मास और अर्धमास पर्व—सन्धियाँ हैं; क्योंकि सन्धिसे उनकी समानता है।<br><br>दिन और रात्रि प्रतिष्ठा है। 'अहोरात्राणि' इस पदमें बहुवचन होनेके कारण प्रजापति, देवता, पितृगण और मनुष्य सभीके दिन-रात¹ प्रतिष्ठा अर्थात् पाद हैं, क्योंकि इनसे वह प्रतिष्ठित होता है। कालात्मा दिनरात्रिके द्वारा प्रतिष्ठित होता है और अश्व पैरोंके द्वारा।
नक्षत्राण्यस्थीनि शुक्लत्वसामान्यात् । नभो नभःस्था मेघा अन्तरिक्षस्योदरत्वोक्तेः, मांसान्युदकरुधिरसेचनसामान्यात् । ऊवध्यं उदरस्थमर्धजीर्णमशनं सिकताशुक्लत्वमें समानता होनेके कारण नक्षत्र अस्थियाँ हैं। आकाश अर्थात् आकाशस्थित मेघ, क्योंकि अन्तरिक्ष (आकाश) की उदररूपता कही जा चुकी है, मांस हैं, क्योंकि जलरूप रुधिर बरसानेमें उनकी मांससे समानता है। अवयवोंके बिलग-बिलग रहनेमें समानता होनेके कारण बालू ऊवध्य-

१. प्रजापतिका एक अहोरात्र दो सहस्र युगका होता है, देवताओंका अहोरात्र उत्तरायण और दक्षिणायनरूप है, पितृगणका अहोरात्र शुक्लपक्ष और कृष्ण पक्ष है तथा मनुष्यका अहोरात्र एक दिन और एक रात्रि है।