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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

Page 385 of 1402

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Page 385

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७९

संस्कृत भाष्यार्थहिन्दी अनुवाद
भवति, सर्वेषां भूतानां वाग्भवति—इत्येवं सर्वभूतात्मतया सर्वज्ञो भवतीत्यर्थः; सर्वकृच्च। यथैषा पूर्वसिद्धा हिरण्यगर्भदेवता एवमेव नास्य सर्वज्ञत्वे सर्वकृत्त्वे वा क्वचित्प्रतिघातः। स इति दाष्ट्रान्तिकनिर्देशः। किञ्च यथैतां हिरण्यगर्भदेवतामिज्यादिभिः सर्वाणि भूतान्यवन्ति पालयन्ति पूजयन्ति, एवं ह एवंविदं सर्वाणि भूतान्यवन्ति—इज्यादिलक्षणां पूजां सततं प्रयुञ्जत इत्यर्थः।जाता है और समस्त भूतोंकी वाक् हो जाता है। तात्पर्य यह है कि इस प्रकार सर्वभूतात्मरूपसे वह सर्वज्ञ हो जाता है तथा सर्वकर्ता भी हो जाता है। जैसा कि यह पूर्वसिद्ध हिरण्यगर्भ देवता है, उसी प्रकार इसके सर्वज्ञत्व और सर्वकर्तृत्त्वमें भी कभी प्रतिघात नहीं होता। ‘सः’ इस शब्दसे दाष्ट्रान्तिकका निर्देश किया गया है। तथा जिस प्रकार इस हिरण्यगर्भ-देवताका समस्त प्राणी यज्ञादिसे पालन—पूजन करते हैं, उसी प्रकार ऐसी उपासना करने वालेका समस्त प्राणी पालन करते हैं अर्थात् उसके लिये निरन्तर यज्ञादि पूजाका प्रयोग करते हैं।
अथेद्माशङ्क्यते—सर्वप्राणिनामात्मा भवतीत्युक्तम्, तस्य च सर्वप्राणिकार्यकरणात्मत्वे सर्वप्राणिसुखदुःखैः सम्बन्ध्येतेति।यहाँ यह शङ्का की जाती है—ऊपर यह बतलाया गया है कि वह समस्त प्राणियोंका आत्मा हो जाता है। इस प्रकार समस्त प्राणियोंके देह और इन्द्रियरूप हो जानेसे तो उसका सब प्राणियोंके सुख-दुःखसे भी सम्बन्ध होगा ही।
तन्न, अपरिच्छिन्नबुद्धित्वात्किन्तु ऐसी बात नहीं है, क्यों-
परिच्छिन्नात्मबुद्धीनां ह्याक्रोशादौ दुःखसम्बन्धो दृष्टः—अनेनाहमा-कि वह अपरिच्छिन्न बुद्धिवाला हो जाता है। जिनकी परिच्छिन्नात्मबुद्धि होती है, उन्हींको गाली आदि देनेपर यह सोचकर कि इसने मुझे गाली दी है, दुःखका सम्बन्ध होता देखा गया है।