बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
DevanagariSanskritpublished1,402 pages
Page 379 of 1402
Read in contextPage 379
ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ ३७३
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
|---|---|
| कर्तव्यतारूपात्पित्रा अकृतात् सर्वस्माल्लोकप्राप्तिप्रतिबन्धरूपात्पुत्रो मुञ्चति मोचयति तत्सर्वं स्वयमनुतिष्ठन्पूरयित्वा । तस्मात्पूरणेन त्रायते स पितरं यस्मात्तस्मात्पुत्रो नाम । इदं तत्पुत्रस्य पुत्रत्वं यत्पितुश्छिद्रं पूरयित्वा त्रायते। | (अपूर्ण) ही रह जाता है तो वह पिताद्वारा नहीं किये हुए लोकप्राप्ति-के प्रतिबन्धरूप उस समस्त कर्तव्यतारूप [बन्धन] से उस सबका स्वयं अनुष्ठान करते हुए उसकी पूर्ति करके पिताको मुक्त करा देता है। अतः वह पुत्र, चूँकि पूर्तिके द्वारा पिताका त्राण करता है, इसलिये 'पुत्र' कहलाता है। पुत्रका पुत्रत्व यही है कि वह पिताके छिद्रकी पूर्ति करके उसका त्राण करता है। |
| स पितैवंविधेन पुत्रेण मृतोऽपि सन्नमृतोऽस्मिन्नेव लोके प्रतितिष्ठति, एवमसौ पिता पुत्रेणेमं मनुष्यलोकं जयति । न तथा विद्याकर्मभ्यां देवलोकपितृलोकौ स्वरूपलाभसत्तामात्रेण; न हि विद्याकर्मणी स्वरूपलाभव्यतिरेकेण पुत्रवद्व्यापारान्तरापेक्षया लोकजयहेतुत्वं प्रतिपद्येते । अथ कृतसम्प्रत्तिकं पितरमेनमेते वागादयः प्राणा दैवा हैरण्यगर्भा अमृता अमरणधर्माण आविशन्ति ॥ १७ ॥ | इस प्रकारके पुत्रके कारण वह पिता मरकर भी अमृत रहता है; अर्थात् इसी लोकमें विद्यमान रहता है। इस प्रकार पुत्रके द्वारा पिता इस मनुष्यलोकपर जय प्राप्त करता है। विद्या और कर्मके द्वारा जिस प्रकार वह देवलोक और पितृलोकपर उनके स्वरूपलाभकी सत्तामात्रसे विजय प्राप्त करता है, उस प्रकार इसे नहीं करता। विद्या और कर्म [देव और पितृलोकके] स्वरूपलाभके सिवा पुत्रके समान किसी व्यापारान्तरकी अपेक्षासे लोकजयके हेतु नहीं होते। फिर, जिसने सम्प्रत्ति-कर्म किया है ऐसे उस पितामें ये वागादि दैव—हिरण्यगर्भसम्बन्धी अमृत—अमरण-धर्मा प्राण आविष्ट होते हैं ॥ १७ ॥ |