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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

Page 376 of 1402

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Page 376
३७०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| वै इदं सर्वं यद्गृहिणा कर्तव्यम्, यदुत वेदा अध्येतव्याः, यज्ञा यष्टव्याः, लोकाश्च जेतव्याः, । एतन्मा सर्वं सन्नयम्--सर्वं हीमं भारं मदधीनं मत्तोऽपच्छिद्य आत्मनि निधाय, इतोऽस्माल्लोकान्मा माम् अभुनजत्पालयिष्यतीति । लुट्‌र्थे लङ्, छन्दसि कालनियमाभावात् । | वह इतना ही है कि वेदोंका अध्ययन करना चाहिये, यज्ञोंका यजन करना चाहिये और लोकोंपर जय प्राप्त करनी चाहिये । 'एतन्मा सर्वं सन्नयम्'—इत्यादिका अभिप्राय यों है कि यह ( पुत्र ) स्वयं ये सब कुछ होकर अर्थात् मेरे अधीन रहनेवाले इस सारे भारको मुझसे लेकर अपने ऊपर रखकर इस लोकसे जानेपर 'माम् अभुनजत्'—मेरा पालन करेगा। यहाँ लृट्के अर्थमें लङ् लकारका प्रयोग हुआ है; क्योंकि वेदमें कालका नियम नहीं है। १ |


१. 'अभुनजत्'—यह 'भुज' धातुकी लङ् लकारकी क्रिया है। लङ् लकार अनद्यतन भूतकालमें प्रयुक्त होता है; इसका पर्याय 'अपालयत्' और अर्थ 'पालन किया' ऐसा होना चाहिये। किंतु भाष्यकार उक्त क्रियाका पर्याय 'पालयिष्यति' लिखते हैं; 'पालयिष्यति' सामान्य भविष्य-वाची 'लृट्' लकारकी क्रिया है, इसके अनुसार 'अभुनजत्' का अर्थ 'पालन करेगा'—ऐसा होता है। प्रकरणके अनुसार ऐसा ही अर्थ होना सुसंगत भी है। परंतु भूतकालिक क्रियाका भविष्यकालिक अर्थ हो कैसे सकता है?—यह प्रश्न सामने आता है। इसका ही उत्तर देते हुए भाष्यकार कहते हैं—'यहाँ 'लृट्' के अर्थमें 'लङ्' का प्रयोग समझना चाहिये; क्योंकि वेदमें कालका नियम नहीं होता।

परंतु इसका भाव यह नहीं समझना चाहिये कि 'वास्तवमें वेदमें कालका कोई निश्चित नियम ही नहीं है, सभी जगह विपरीत ही रूप मिलते हैं।' भाष्यकारके उस कथनका यह अभिप्राय जान पड़ता है कि वेदमें भूत, वर्तमान और भविष्यका निश्चित स्वरूप होते हुए भी कहीं-कहीं इसमें व्यत्यय (वैपरीत्य) भी देखा जाता है; इसलिये यहाँ कालका व्यत्यय समझना चाहिये अर्थात् भविष्यकालके ही अर्थमें भूतकालकी क्रियाका यहाँ प्रयोग हुआ है—ऐसा मानना चाहिये। सूत्रकार महर्षि पाणिनिने 'व्यत्ययो बहुलम्' (पा० सू० ३।१।८५) इस सूत्रके द्वारा ऐसे स्थलोंका निर्देश किया है। व्यत्यय केवल कालका