बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
Page 300 of 1402
Read in context| २९४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| समीपस्था उभयविवेकज्ञाः—धर्मं वदतीति, प्रसिद्धं लौकिकं न्यायं वदतीति। तथा विपर्ययेण धर्मं वा लौकिकं व्यवहारं वदन्तमाहुः—सत्यं वदति, शास्त्रादनपेतं वदतीति।<br><br>एतद्यदुक्तमुभयं ज्ञायमानमनुष्ठीयमानं चैतद्धर्म एव भवति। तस्मात्स धर्मो ज्ञानानुष्ठानलक्षणः शास्त्रज्ञानितरांश्च सर्वानिंव नियमयति। तस्मात्स क्षत्रस्यापि क्षत्रम्। अतस्तदभिमानोऽविद्वांस्तद्विशेषानुष्ठानाय ब्रह्मक्षत्रविट्शूद्रनिमित्तविशेषमभिमन्यते। तानि च निसर्गत एव कर्माधिकारनिमित्तानि ॥ १४ ॥ | करनेवालेको उसके समीपवर्ती धर्म और सत्यका रहस्य जाननेवाले लोग 'यह धर्ममय वचन बोलता है, प्रसिद्ध लौकिकन्याय बोलता है' ऐसा कहते हैं और इसी तरह इससे विपरीत धर्म यानी लौकिक व्यवहार बतानेवालेको 'यह सत्य बोलता है, शास्त्रके अनुकूल बोलता है' ऐसा कहते हैं।<br><br>ये जो जानी जानेवाली और की जानेवाली दो बातें बतायी गयी हैं- ये दोनों धर्म ही हैं। अतः यह ज्ञान और अनुष्ठानरूप धर्म शास्त्रज्ञ और अशास्त्रज्ञ सभीका नियमन करता है। इसलिये वह क्षत्रका भी क्षत्र है। अतः उसका अभिमान रखनेवाला अज्ञानी पुरुष उसके किसी विशेष रूपका अनुष्ठान करनेके लिये ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्ररूप किसी निमित्तविशेषमें अभिमान करने लगता है। ये ब्राह्मणादि वर्ण स्वभावतः ही कर्माधिकारके कारण हैं ॥ १४ ॥ |
आत्मोपासनकी आवश्यकता
तदेतद्ब्रह्म क्षत्रं विट्शूद्रस्तदग्निनैव देवेषु ब्रह्माभवद्ब्राह्मणो मनुष्येषु क्षत्रियेण क्षत्रियो वैश्येन वैश्यः शूद्रेण शूद्रस्तस्मादग्नावेव देवेषु लोकमिच्छन्ते ब्राह्मणे मनुष्ये-