Skip to content
SarvaKosh
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

Page 140 of 1402

Read in context
Page 140
१३४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

ते देवा अब्रुवन्नेतावद्वा इदग्ँ सर्वं यदन्नं तदात्मन आगासीरनु नोऽस्मिन्नन्न आभजस्वेति ते वै माभिसंविशतेति तथेति तग्ँ समन्तं परिष्व्यविशन्त । तस्माद्यदनेनान्नमत्ति तेनैतास्तृप्यन्त्येवग्ँ ह वा एनग्ँ स्वा अभिसंविशन्ति भर्ता स्वानाग्ँ श्रेष्ठः पुर एता भवत्यन्नादोऽधिपतिर्य एवं वेद य उ हैवंविदग्ँ स्वेषु प्रति प्रतिर्बुभूषति न हैवालं भार्येभ्यो भवत्यथ य एवैतमनु भवति यो वैतमनु भार्यान्बुभूर्षति स हैवालं भार्येभ्यो भवति ॥ १८ ॥

वे देवगण बोले, "यह जो अन्न है वह सब तो इतना ही है; उसे तुमने अपने लिये आगान कर लिया है। अतः अब पीछेसे हमें भी इस अन्नमें भागी बनाओ।" [ प्राणने कहा ] "वे तुमलोग सब ओरसे मुझमें प्रवेश कर जाओ।" तब 'बहुत अच्छा' ऐसा कहकर वे सब ओरसे उसमें प्रवेश कर गये। अतः प्राणके द्वारा पुरुष जो अन्न खाता है उससे ये प्राण भी तृप्त होते हैं। अतः जो इस प्रकार जानता है उसका ज्ञातिजन सब ओरसे आश्रय ग्रहण करते हैं, वह स्वजनोंका भरण करनेवाला, उनमें श्रेष्ठ और उनके आगे चलनेवाला होता है तथा अन्न भक्षण करनेवाला और सबका अधिपति होता है। ज्ञातियोंमेंसे जो भी इस प्रकार जाननेवालेके प्रति प्रतिकूल होना चाहता है वह अपने आश्रितोंका पोषण करनेमें समर्थ नहीं होता और जो भी इसके अनुकूल रहता है—जो भी इसके अनुसार रहकर अपने आश्रितोंका भरण करना चाहता है वह निश्चय ही अपने आश्रितोंके भरणमें समर्थ होता है॥ १८॥

ते वागादयो देवाः, स्वविषय-<br><br>द्योतनाद्देवाः, अब्रुवन्नुक्तवन्तो<br><br>मुख्यं प्राणम् इदमेतावन्नातोऽधि-उन वागादि देवताओंने, जो अपने विषयका द्योतन (प्रकाशन) करनेके कारण देवता हैं, मुख्य प्राणसे कहा—"यह [अन्न] तो इतना ही है, इससे अधिक नहीं