बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
Page 132 of 1402
Read in context| १२६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
| :--- | :--- |
| प्राणोऽपहन्तेत्युच्यते। विरोधादेव तु पाप्मैवंविदो दूरं गतो भवति। किं पुनश्चकार देवतानां पाप्मानं मृत्युमपहृत्य ? इत्युच्यते—यत्र यस्मिन्नासां प्राच्यादीनां दिशामन्तोऽवसानं तत्तत्र गमयाञ्चकार गमनं कृतवानित्येतत्। | गया है, उससे विरोध होनेके कारण ही इस प्रकार जाननेवालेका पाप दूर चला जाता है। देवताओंके पापरूप मृत्युको उनसे अलग कर फिर प्राणदेवताने क्या किया, सो बतलाया जाता है—जहाँ यानी जिस स्थानपर इन पूर्वादि दिशाओंका अन्त-अवसान है वहाँ उसे पहुँचा दिया अर्थात् वहाँ उसका गमन करा दिया। |
| ननु नास्ति दिशामन्तः कथमन्तं गमितवान् ? इत्युच्यते— | किंतु दिशाओंका तो अन्त ही नहीं है, फिर उसे दिशान्तमें कैसे पहुँचा दिया ? इसपर हमारा कथन यह है कि दिशाओंकी कल्पना श्रौत-विज्ञानवान् पुरुषोंकी सीमापर्यन्त ही की गयी है, अतः उनसे विरुद्ध आचरणवाले लोगोंसे बसा हुआ देश ही दिशाओंका अन्त है; जैसे कि देशका अन्त अरण्य होता है उसी प्रकार ऐसा माननेमें भी दोष नहीं है। |
| श्रौतविज्ञानवज्जनावधिनिमित्तकल्पितत्वादिशां तद्विरोधिजनाध्युषित एव देशो दिशामन्तः, देशान्तोऽरण्यमिति यद्वदित्यदोषः। | |
| तत्तत्र गमयित्वा आसां देवतानाम्, पाप्मन इति द्वितीयाबहुवचनम्, विन्यदधाद्विविधं न्यग्भावेनादधात्स्थापितवती प्राणदेवता। प्राणात्माभिमानशून्येषु | इन देवताओंके पापोंको वहाँ पहुँचाकर प्राणदेवताने उसे विविध प्रकारसे निम्नभावसे (तिरस्कारपूर्वक) निहित-स्थापित कर दिया। ‘पाप्मनः’ पद द्वितीयाबहुवचनान्त है। प्रसङ्गके सामर्थ्यसे ज्ञात होता है कि उसे प्राणात्माभिमानशून्य |