बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
DevanagariSanskritpublished1,402 pages
Page 129 of 1402
Read in contextPage 129
ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ [१२३
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| स्यात्, उपासनक्रियायाः कर्मभावेन गुणभूतत्वात् । | उपासनाक्रियाके कर्मभावसे गुणभूत होनेके कारण वह देवता भी है।¹ |
| यस्मात्सा दूर्नाम दूरित्येवं ख्याता। नामशब्दः ख्यापनपर्यायः। तस्मात्प्रसिद्धास्या विशुद्धिर्दूर्नामत्वात्। कुतः पुनर्दूर्नामत्वम्? इत्याह—दूरं दूरेः हि यस्मादस्याः प्राणदेवताया मृत्युरसङ्गलक्षणः पाप्मा। असंश्लेषधर्मित्वात्प्राणस्य समीपस्थस्यापि दूरता मृत्योस्तस्माद् दूरित्येवं ख्यातिः, एवं प्राणस्य विशुद्धिर्ज्ञापिता। | क्योंकि यह प्राण देवता 'दूर्' नामवाली है अर्थात् 'दूर्' इस प्रकार विख्यात है—यहाँ 'नाम' शब्द 'ख्याति' का पर्याय है—अतः 'दूर्' नामवाली होनेसे इसकी विशुद्धि भी प्रसिद्ध है। इसका 'दूर्' नाम क्यों है ? इसपर श्रुति कहती है—क्योंकि इस प्राणदेवतासे मृत्यु यानी आसक्तिरूप पाप दूर है। प्राण असंसर्गधर्मी है, इसलिये समीपस्थ होनेपर भी इससे मृत्युकी दूरता है, अतः 'दूर्' इस प्रकार ही इसकी प्रसिद्धि है; इस तरह प्राणकी विशुद्धि बतलायी गयी। |
| विदुषः फलमुच्यते—दूरं ह वा अस्मान्मृत्युर्भवति। अस्मादेवंविदः, य एवं वेद तस्मादेवमिति प्रकृतं विशुद्धिगुणोपेतं प्राणमुपास्त इत्यर्थः। | अब इसके विद्वान् (उपासक) का फल बतलाया जाता है—इससे मृत्यु दूर रहता है। इससे अर्थात् इस प्रकार जाननेवालेसे यानी जो इस प्रकार जानता है उससे। इस प्रकार अर्थात् जो विशुद्धिगुणविशिष्ट प्राणकी उपासना करता है। |
| उपासनं नाम उपास्यार्थवादे यथा देवतादिस्वरूपं श्रुत्या ज्ञाप्यते | उपास्य-सम्बन्धी अर्थवादमें श्रुतिके द्वारा देवतादिका जैसा |
१. क्योंकि जिस प्रकार यज्ञमें कारकरूपसे देवगण गुणभूत होते हैं, उसी प्रकार प्राण भी द्रव्यादिसे पृथक् विहित क्रियामें गुणभूत होनेके कारण देवता है।