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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished417 pages

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( ७ )
अनुरूप प्राप्त होनेवाले फलके विषयमें निर्णय किया गया है; इस कारण उसकी
'फलाध्याय' के नामसे प्रसिद्धि है। इस ग्रन्थमें वर्णित समग्र विषयोंका संक्षिप्त
परिचय विषय-सूचीसे अवगत हो सकता है। यहाँ कुछ चुनी हुई सैद्धान्तिक बातोंका
दिग्दर्शन कराया जाता है। ब्रह्मसूत्रमें पूज्यपाद वेदव्यासजीने अपने सिद्धान्तका
प्रतिपादन करते समय मेरी अल्पबुद्धिके अनुसार इस प्रकार निर्णय दिया है—
( १ ) यह प्रत्यक्ष उपलब्ध होनेवाला जो जडचेतनात्मक जगत् है, इसका
उपादान और निमित्तकारण ब्रह्म ही है ( ब्र० सू० १ । १ । २ )।
( २ ) सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमेश्वरकी जो परा ( चेतन जीवसमुदाय )
और अपरा ( परिवर्तनशील जडवर्ग ) नामक दो प्रकृतियाँ हैं, वे उसीकी अपनी
शक्तियाँ हैं, इसलिये उससे अभिन्न हैं ( ३ । २ । २८ )। वह इन शक्तियोंका
आश्रय है, अतः इनसे भिन्न भी है। परब्रह्म जीव और जडवर्गसे सर्वथा विलक्षण
और उत्तम है ( ३ । २ । ३१ )।
( ३ ) वह परब्रह्म परमेश्वर अपनी उपर्युक्त दोनों प्रकृतियोंको लेकर ही
सृष्टिकालमें जगत्की रचना करता है और प्रलयकालमें इन दोनों प्रकृतियोंको
अपनेमें विलीन कर लेता है।
( ४ ) परब्रह्म परमात्मा शब्द, स्पर्श आदिसे रहित, निर्विशेष, निर्गुण एवं
निराकार भी है तथा अनन्त कल्याणमय गुणसमुदायसे युक्त सगुण एवं साकार
भी है। इस प्रकार एक ही परमात्माका यह उभयविध स्वरूप स्वाभाविक तथा
परम सत्य है, औपाधिक नहीं है ( ३ । २ । ११ से २६ तक )।
( ५ ) जीव-समुदाय उस परब्रह्मकी परा प्रकृतिका समूह है, इसलिये
उसीका अंश है ( २ । ३ । ४३ )। इसी दृष्टिसे वह अभिन्न भी है। तथापि
परमेश्वर जीवके कर्मफलोंकी व्यवस्था करनेवाला ( ३ । २ । ३८ ) सबका
नियन्ता और स्वामी है।
( ६ ) जीव नित्य है ( २ । ३ । १७ )। उसका जन्मना और मरना
शरीरके सम्बन्धसे औपचारिक है ( २ । ३ । १६ )।
( ७ ) जीवका एक शरीरसे दूसरे शरीरमें और लोकान्तरमें भी जाना-
आना शरीरके सम्बन्धसे ही है। ब्रह्मलोकमें भी वह सूक्ष्मशरीरके सम्बन्धसे ही
जाता है ( ४ । २ । ९ )।