ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)
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Read in contextतीसरा पाद
सम्बन्ध—पहले दो पादोंमें सर्वान्तर्यामी परब्रह्म परमात्माके व्यापक रूपका
भलीभाँति प्रतिपादन किया गया । अब उसी परमेश्वरको सबका आधार
बतलाते हुए तीसरा पाद आरम्भ करते हैं—
द्युभ्वाद्यायतनं स्वशब्दात् ॥ १ । ३ । १ ॥
द्युभ्वाद्यायतनम् = ( मु० उ० २ । २ । ५ मे ) स्वर्ग और पृथिवी
आदिका जो आधार बताया गया है ( वह परब्रह्म परमात्मा ही है );
स्वशब्दात् = क्योंकि वहाँ उस परमात्माके बोधक 'आत्मा' शब्दका प्रयोग है।
व्याख्या—मुण्डकोपनिषद् ( २ । २ । ५ ) मे कहा गया है कि—
'यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतं मनः सह प्राणैश्च सर्वैः ।
तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथामृतस्यैष सेतुः ॥'
अर्थात् 'जिसमे स्वर्ग, पृथिवी और उसके बीचका आकाश तथा समस्त
प्राणोंके सहित मन गुँथा हुआ है, उसी एक सबके आत्मरूप परमेश्वरको
जानो, दूसरी सब बातोको सर्वथा छोड़ दो । यही अमृतका सेतु है ।'
इस मन्त्रमें जिस एक आत्माको उपर्युक्त ऊँचे-से-ऊँचे स्वर्ग और नीचे पृथिवी
आदि सभी जगत्का आधार बताया है; वह परब्रह्म परमेश्वर ही है, जीवात्मा या
प्रकृति नहीं; क्योंकि इसमे परब्रह्मबोधक 'आत्मा' शब्दका प्रयोग है।
सम्बन्ध—उपर्युक्त बातकी सिद्धिके लिये दूसरा हेतु देते हैं—
मुक्तोपसृप्यव्यपदेशात् ॥ १ । ३ । २ ॥
मुक्तोपसृप्यव्यपदेशात् = ( उस सर्वाधार परमात्माको ) मुक्त पुरुषोंके
लिये प्राप्य बतलाया गया है, इसलिये ( वह जीवात्मा नहीं हो सकता ) ।
व्याख्या—उक्त उपनिषद्मे ही आगे चलकर कहा गया है कि—
'यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रेऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय ।
तथा विद्वांनामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥' (मु० उ० ३।२।८)
'जिस प्रकारबहती हुई नदियों नाम-रूपको छोड़कर समुद्रमे विलीन हो जाती