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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

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Page 63

४२ वेदान्त-दर्शन [पाद २
चेत्=यदि कहो; शब्दादिभ्यः=शब्दादि हेतुओंसे अर्थात् अन्य श्रुतिमे
वैश्वानर शब्द अग्निके अर्थमे विशेषरूपमें प्रयुक्त हुआ है और इस मन्त्रमे गार्हपत्य
आदि अग्नियोंको वैश्वानरका अङ्ग बताया गया है, इसलिये; च=तथा; अन्तः-
प्रतिष्ठानात्=श्रुतिमें वैश्वानरको शरीरके भीतर प्रतिष्ठित कहा गया है, इसलिये
भी; न=(यहाँ वैश्वानर शब्द परब्रह्म परमात्माका वाचक) नहीं है; इति न=तो यह
कहना ठीक नहीं है; तथा दृष्ट्युपदेशात्=क्योंकि वहाँ वैश्वानरमें ब्रह्मदृष्टि
'करनेका उपदेश है; असंम्भवात्=इसके सिवा, केवल जठरानलका विराट्रूपमें
वर्णन होना संभव नहीं है, इसलिये; च=तथा; एनम्=इस वैश्वानरको;
पुरुषम्=‘पुरुष’ नाम देकर; अपि=भी; अधीयते=पढ़ते है ( इसलिये उक्त
प्रकरणमे वैश्वानर शब्द परब्रह्मका ही वाचक है )।
व्याख्या—यदि कहो कि अन्य श्रुतिमे ‘स यो हैतमेवमग्निं वैश्वानरं पुरुषविधं
पुरुषेऽन्तःप्रतिष्ठितं वेद ।’ ( शतपथब्रा० १०।६।१।११) अर्थात्
‘जो इस वैश्वानर अग्निको पुरुषके आकारका तथा पुरुषके भीतर प्रतिष्ठित
जानता है ।’ इस प्रकार वैश्वानर शब्द अग्निके विशेषणरूपसे प्रयुक्त हुआ है,
तथा जिस श्रुतिपर विचार चल रहा है, इसमे भी गार्हपत्य आदि तीनो अग्नियोको
वैश्वानरका अङ्ग बताया गया है । इसी प्रकार भगवद्गीतामें भी कहा है कि ‘मैं ही
वैश्वानररूपसे प्राणियोंके शरीरमे स्थित हो चार प्रकारके अन्नका पाचन करता
हूँ।’ (१५।१४) इन सब कारणोंसे यहाँ वैश्वानरके नामसे जठराग्निका ही वर्णन
है, परमात्माका नहीं, तो यह कहना ठीक नहीं है; क्योकि शतपथब्राह्मणकी
श्रुतिमें जो वैश्वानर अग्निको जाननेकी बात कही गयी है, वह जठराग्निमें ब्रह्म-
दृष्टि करानेके उद्देश्यसे ही है । यदि ऐसा न होता तो उसको पुरुष नहीं कहा
जाता । तथा श्रीमद्भगवद्गीतामे भी जो वैश्वानर अग्निको सब प्राणियोंके शरीरमें
स्थित बताया है, वहाँ भी उसमे परमात्मबुद्धि करानेके लिये भगवान्ने अपनी
विभूतिके रूपमे ही कहा है । इसके सिवा, जिसपर विचार चल रहा है, उस
श्रुतिमे समस्त ब्रह्माण्डको ‘वैश्वानर’ का शरीर बताया है, सिरसे लेकर पैरतक
उसके अङ्गोमे समस्त लोकोंकी कल्पना की गयी है । यह जठराग्निके लिये
असम्भव भी है । एवं शतपथब्राह्मणमें तथा यहाँ भी इस वैश्वानरको पुरुषके
आकारवाला और पुरुष कहा गया है; जो कि जठराग्निके उपयुक्त नहीं है ।
इन सब कारणोंसे इस प्रकरणमे कहा हुआ वैश्वानर परब्रह्म परमेश्वर ही है ।
जठराग्नि या अन्य कोई नहीं ।