Skip to content
SarvaKosh
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

Page 53 of 417

Read in context
Page 53

३२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
दीखता है, वह मैं हूँ ।' इसको जानकर उपासना करनेका फल भी उन्होंने
दूसरी अग्नियोंकी भाँति ही बतलाया । तदनन्तर सब अग्नियोंने एक साथ कहा,
'हे उपकोशल ! हमने तुमको हमारी विद्या ( अग्नि-विद्या ) और आत्म-विद्या
दोनों ही बतलायी है । आचार्य तुमको इनका मार्ग दिखलावेंगे ।' इतनेमें ही
उसके गुरु सत्यकाम आ गये । आचार्यने पूछा, 'सौम्य ! तेरा मुख ब्रह्मवेत्ताकी
भाँति चमकता है, तुझे किसने उपदेश दिया है ?' उपकोशलने अग्नियोंकी ओर
संकेत किया । आचार्यने पूछा, 'इन्होंने तुझे क्या बतलाया है ?' तब उपकोशलने
अग्नियोंसे सुनी हुई सब बातें बता दीं । तत्पश्चात् आचार्यने कहा, 'हे सौम्य !
इन्होंने तुझे केवल उत्तम लोकप्राप्तिके साधनका उपदेश दिया है, अब मैं तुझे
वह उपदेश देता हूँ, जिसको जान लेनेवालेको पाप उसी प्रकार स्पर्श नहीं कर
सकते, जैसे कमलके पत्तेको जल ।' उपकोशलने कहा, 'भगवन् ! बतलानेकी
कृपा कीजिये ।' इसके उत्तरमें आचार्यने कहा, 'जो नेत्रमे यह पुरुष दिखलायी
देता है, यही आत्मा है, यही अमृत है, यही अभय और ब्रह्म है ।' उसके
बाद उसीको 'संयद्वाम' 'वामनी' और 'भामनी' बतलाकर अन्तमें इन विद्याओका
फल अर्चिर्मागसे ब्रह्मको प्राप्त होना बताया है ।
इस प्रकरणको देखनेसे मालूम होता है कि आँखके भीतर दीखनेवाला पुरुष
परब्रह्म ही है, जीवात्मा या प्रतिबिम्बके लिये यह कथन नहीं है; क्योकि ब्रह्मविद्या-
के प्रसङ्गमे उसका वर्णन करके उसे आत्मा, अमृत, अभय और ब्रह्म कहा है ।
इन विशेषणोंकी उपपत्ति ब्रह्ममे ही लग सकती है, अन्य किसीमे नहीं ।
सम्बन्ध—अब यह जिज्ञासा होती है कि यहाँ ब्रह्मको आँखमे दीखनेवाला
पुरुष क्यों कहा गया ? वह किसी स्थानविशेषमें रहनेवाला थोड़े ही है ? इसपर
कहते हैं—
स्थानादिव्यपदेशाच्च ॥ १ । २ । १४ ॥
स्थानादिव्यपदेशात् = श्रुतिमे अनेक स्थलोंपर ब्रह्मके लिये स्थान आदिका
निर्देश किया गया है, इसलिये; च = भी ( नेत्रान्तर्वर्ती पुरुष यहाँ ब्रह्म ही है ) ।
व्याख्या—श्रुतिमें जगह-जगह ब्रह्मको समझानेके लिये उसके स्थान तथा
नाम, रूप आदिका वर्णन किया गया है । जैसे अन्तर्यामि-ब्राह्मण ( बृह० उ०
३ । ७ । ३—२३ ) में ब्रह्मको पृथ्वी आदि अनेक स्थानोंमें स्थित बताया