Skip to content
SarvaKosh
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

Page 48 of 417

Read in context
Page 48

सूत्र ७-८ ] अध्याय १ २७
उसे हृदयस्थ बता देनेमात्रसे उसका एकदेशीय होना सिद्ध नहीं होता तथा जो
उसे धान, जौ, सरसो और सार्षोसे भी छोटा बताया गया है, इससे श्रुतिका उद्देश्य
उसे छोटे आकारवाला बताना नहीं है, अपितु अत्यन्त सूक्ष्म और इन्द्रियोंद्वारा
अग्राह्य ( ग्रहण करनेमे न आनेवाला ) बतलाना है। इसीलिये उसी मन्त्रमे यह भी
कहा गया है कि वह पृथ्वी, अन्तरिक्ष, द्युलोक और समस्त लोकोसे भी बड़ा है।
भाव यह है कि वह इतना सूक्ष्म होते हुए भी समस्त लोकोंके बाहर-भीतर
व्याप्त और उनसे परे भी है। सर्वत्र वही है। इसलिये यहाँ उपास्यदेव परब्रह्म
परमात्मा ही है, दूसरा कोई नहीं।
सम्बन्ध-परब्रह्म परमात्मा सबके हृदयमे स्थित होकर भी उनके सुख-दुःख-
से अभिभूत नहीं होता; उसकी इस विशेषताको बतानेके लिये कहते हैं-
संभोगप्राप्तिरिति चेन्न वैशेष्यात् ॥ १ । २ । ८ ॥
चेत्=यदि कहो; संभोगप्राप्तिः=( सबके हृदयमे स्थित होनेसे चेतन होनेके
कारण उसको ) सुख-दुःखोंका भोग भी प्राप्त होता होगा; इति न=तो ऐसा कहना
ठीक नहीं है; वैशेष्यात्=क्योंकि जीवात्माकी अपेक्षा उस परब्रह्ममे विशेषता है।
व्याख्या-यदि कोई यह शङ्का करे कि आकाशकी भाँति सर्वव्यापक
परमात्मा समस्त प्राणियोंके हृदयमे स्थित होनेके कारण उन जीवोंके सुख-दुःखों-
का भोग भी करता ही होगा; क्योकि वह आकाशकी भाँति जड नहीं, चेतन है
और चेतनमे सुख-दुःखकी अनुभूति स्वाभाविक है, तो यह कथन ठीक नहीं है;
क्योंकि परमात्मामे कर्तापनका अभिमान और भोक्तापन नहीं है। वह सबके हृदयमे
रहता हुआ भी उनके गुण-दोषोसे सर्वथा असङ्ग है। यही जीवोकी अपेक्षा उसमे
विशेषता है। जीवात्मा तो अज्ञानके कारण कर्ता और भोक्ता है; किन्तु परमात्मा
सर्वथा निर्विकार है। वह केवलमात्र साक्षी है, भोक्ता नहीं (मु० उ० ३ । १ । १)*
इसलिये जीवोंके कर्मफलरूप सुख-दुःखादिसे उसका सम्बन्ध होना सम्भव नहीं है।
सम्बन्ध--ऊपर कहे हुए प्रकरणमें यह सिद्ध किया गया कि सबके हृदयमें
निवास करते हुए भी परब्रह्म भोक्ता नहीं है; परन्तु वेदान्तमें कहीं-कहीं परमात्मा-
को भोक्ता भी बताया गया है ( क० उ० १ । २ । २५ )। फिर वह वचन

  • तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥ ( मु० उ० ३ । १ । १ );