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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

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Page 403

३८२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
उपासना करके मेरे सदृश धर्मोंको अर्थात् निर्लेपता आदि दिव्य कल्याणमय
भावोंको प्राप्त हो जाते हैं; अतः वे न तो जगत्की रचनाके कालमे उत्पन्न
होते हैं और न प्रलयकालमें मरनेका दुःख ही भोगते हैं ।'* इस प्रकार श्रुतियों
और स्मृतियोंमे जगह-जगह मुक्तात्माकी वैसी स्थिति दिखायी गयी है । उसका
जो उन-उन अधिकारीवर्गोंके लोकोंमें जाना-आना और वहाँके भोगोंका उपभोग
करना है, वह लीलमात्र है, बन्धनकारक या पुनर्जन्मका हेतु नहीं है ।
सम्बन्ध—ब्रह्मलोकमें जानेवाले मुक्तात्माका जगत्की उत्पत्ति आदिमें
अधिकार या सामर्थ्य नहीं है, इस पूर्वोक्त बातको इस प्रकरणके अन्तमें पुनः
सिद्ध करते हैं—
भोगमात्रसाम्यलिङ्गाच्च ॥ ४ । ४ । २१ ॥
भोगमात्रसाम्यलिङ्गात् = भोगमात्रमें समतारूप लक्षणसे; च = भी ( यही
सिद्ध होता है कि उसका जगत्की रचना आदिमें अधिकार नहीं होता )।
व्याख्या—जिस प्रकार वह ब्रह्म समस्त दिव्य कल्याणमय भोगोंका उपभोग
करता हुआ भी उनसे लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार यह मुक्तात्मा भी उस
ब्रह्मलोकमें रहते समय, उपासनाकालमें की हुई भावनाके अनुसार प्राप्त हुए
वहाँके दिव्य भोगोंका विना शरीरके स्वप्नकी भाँति केवल संकल्पसे या शरीर-
धारणपूर्वक जाग्रत्की भाँति उपभोग करके भी उनसे लिप्त नहीं होता । इस
प्रकार भोगमात्रमे उस ब्रह्मके साथ उसकी समानता है । इस लक्षणसे भी यही
सिद्ध होता है कि जगत्की रचना आदि कार्यमे उसका ब्रह्मके समान किसी भी
अंशमे अधिकार या सामर्थ्य नहीं है ।
सम्बन्ध—यदि ब्रह्मलोकको प्राप्त होनेवाले मुक्त आत्माकी सामर्थ्य सीमित
है, परमात्माके समान असीम नहीं है, तब तो उसके उपभोगका समय पूर्ण
होनेपर उसका पुनर्जन्म भी हो सकता है ? इसपर कहते हैं—
अनावृत्तिः शब्दादनावृत्तिः शब्दात् ॥ ४ । ४ । २२ ॥

  • इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।
    सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥
    ( गीता १४ । २ )