ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)
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Read in context३८० वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
गया है। इन दोनो कारणोंसे यही बात सिद्ध होती है कि इस जडचेतनात्मक
समस्त जगत्की रचना, उसका संचालन और प्रलय आदि जितने भी कार्य हैं,
उनमें उन मुक्तात्माओंका कोई हाथ या सामर्थ्य नहीं है, वे केवल वहाँके दिव्य
भोगोंका उपभोग करनेकी ही यथेष्ट सामर्थ्य रखते हैं।
सम्बन्ध—इसपर पूर्वपक्ष उठाकर उसके समाधानपूर्वक पूर्वसूत्रमें कहे हुए
सिद्धान्तको पुष्ट करते हैं—
प्रत्यक्षोपदेशादिति चेन्नाधिकारिकमण्डलस्थोक्तेः ॥ ४ । ४ । १८ ॥
चेत्=यदि कहो कि; प्रत्यक्षोपदेशात्=वहाँ प्रत्यक्षरूपसे इच्छानुसार
लोकोंमे विचरनेका उपदेश है, अर्थात् वहाँ जाकर इच्छानुसार कार्य करनेका
अधिकार बताया गया है; इति न=तो यह बात नहीं है; आधिकारिकमण्डल-
स्थोक्तेः=क्योकि वह कहना अधिकारियोके लोकोंमें स्थित भोगोंका उपभोग
करनेके लिये ही है।
व्याख्या—यदि कोई ऐसी शङ्का करे कि 'वह स्वराट् हो जाता है,
उसकी, समस्त लोकोंमें इच्छानुसार गमन करनेकी शक्ति हो जाती' है।'
(छा० उ० ७ । २५ । २) 'वह स्वाराज्यको प्राप्त हो जाता है।' (तै० उ० १ ।
६ । २) इत्यादि श्रुतिवाक्योंमे उसे स्पष्ट शब्दोंमें खराट् ओर स्वाराज्यको प्राप्त बताया
है तथा इच्छानुसार भिन्न-भिन्न लोकोंमे विचरनेकी सामर्थ्यसे सम्पन्न कहा गया है,
इससे उसका जगत्की रचना आदिके कार्यमें अधिकार है, यह स्वतः सिद्ध हो
जाता है, तो ऐसी बात नहीं है, क्योकि वहाँ यह भी कहा है कि 'वह सबके
मनके स्वामीको प्राप्त हो जाता है।' (तै० उ० १ । ६ । २)। अतः उसकी
सब सामर्थ्य उस ब्रह्मलोककी प्राप्तिके प्रभावसे है और ब्रह्माके अधीन है, इसलिये
जगत्के कार्यमे हस्तक्षेप करनेकी उसमे शक्ति नहीं है। उसे जो शक्ति
और अधिकार दिये गये हैं, वे केवल उन-उन अधिकारियोंके लोकोमे स्थित
भोगोंका उपभोग करनेकी स्वतन्त्रताके लिये ही हैं। अतः वह कथन
वहींके लिये है।
सम्बन्ध—यदि इस प्रकार उन-उन लोकोंके विकारमय भोगोंका उपभोग
करनेके लिये ही वे सब शरीर, शक्ति और अधिकार आदि उसे मिले हैं, तब