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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

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Page 382

तीसरा पाद
दूसरे पादमें यह बताया गया कि ब्रह्मलोकमें जानेके मार्गका आरम्भ
होनेसे पूर्वतककी गति ( वाणीका मनमें लय होना आदि ) विद्वान् और अविद्वान्
दोनोंके लिये एक समान है; फिर अविद्वान् कर्मानुसार संसारमें पुनः नूतन
शरीर ग्रहण करता है और ज्ञानी महापुरुष ज्ञानसे प्रकाशित मोक्षनाडीद्वारका
आश्रय ले सूर्यकी रश्मियोंद्वारा सूर्यलोकमें पहुँचकर वहाँसे ब्रह्मलोकमें चला जाता
है। रात्रि और दक्षिणायन-कालमें भी विद्वान्‌की इस ऊर्ध्वगतिमें कोई बाधा
नहीं आती; किन्तु ब्रह्मलोकमें जानेका जो मार्ग है, उसका वर्णन कहीं '
अर्चिर्मार्ग, कहीं उत्तरायणमार्ग और कहीं देवयानमार्गके नामसे किया गया
है तथा इन मार्गोंके चिह्न भी भिन्न-भिन्न बताये गये हैं। इसलिये यह जिज्ञासा
होती है कि उपासना और अधिकारीके भेदसे ये मार्ग भिन्न-भिन्न हैं या एक
ही मार्गके ये सभी नाम हैं? इसके सिवा, मार्गमें कहीं तो नाना देवताओंके
लोकोंका वर्णन आता है, कहीं दिन, पक्ष, मास, अयन और संवत्सरका वर्णन
आता है और कहीं केवल सूर्यरश्मियों तथा सूर्यलोकका ही वर्णन आता है;
यह वर्णनका भेद एक मार्ग माननेसे किस प्रकार संगत होगा? अतः इस
विषयका निर्णय करनेके लिये तीसरा पाद तथा अगला प्रकरण आरम्भ किया
जाता है—
अर्चिरादिना तत्प्रथितेः ॥ ४ । ३ । १ ॥
अर्चिरादिना = अर्चिसे आरम्भ होनेवाले एक ही मार्गसे ( ब्रह्मलोकको जाते
हैं ); तत्प्रथितेः = क्योंकि ब्रह्मज्ञानियोंके लिये यह एक ही मार्ग ( विभिन्न नामोंसे )
प्रसिद्ध है।
व्याख्या—श्रुतियोंमें ब्रह्मलोकमें जानेके लिये विभिन्न नामोंसे जिसका वर्णन
किया गया है, वह एक ही मार्ग है, अनेक मार्ग नहीं हैं। उस मार्गका प्रसिद्ध
नाम अर्चिः आदि है, क्योंकि वह अर्चिसे प्रारम्भ होनेवाला मार्ग है। इसीसे
ब्रह्मलोकमें जानेवाले सब साधक जाते हैं। इसीका देवयान, उत्तरायणमार्ग
आदि नामोंसे वर्णन आया है। तथा मार्गमें आनेवाले लोकोंका जो वर्णन आता
है, वह कहीं कम है, कहीं अधिक है। उन स्थलोंमें जहाँ जिस लोकका वर्णन