ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)
Page 38 of 417
Read in contextसूत्र २५-२६ ] अध्याय १ १७
चेतोऽर्पणनिगदात्=ब्रह्ममे चित्तका समर्पण बताया गया है; तथा हि दर्शनम्=
वैसा ही वर्णन दूसरी जगह भी देखा जाता है।
व्याख्या—पूर्व प्रकरणमे 'गायत्री ही यह सब कुछ है' (छा० उ० ३ ।
१२ । १) इस प्रकार गायत्रीछन्दका वर्णन होनेसे उसीके चार पादोका वहाँ
वर्णन है, ब्रह्मका नहीं; ऐसी धारणा बना लेना ठीक नहीं है; क्योकि गायत्रीनामक
छन्दके लिये यह कहना नहीं बन सकता कि यह जड-चेतनात्मक सम्पूर्ण जगत्
गायत्री ही है। इसलिये यहाँ ऐसा समझना चाहिये कि सबके परम कारण
सर्वात्मक परब्रह्म परमेश्वरमे चित्तका समाधान करानेके लिये उस ब्रह्मका ही वहाँ
इस प्रकार गायत्री-नामसे वर्णन किया गया है। इसी तरह अन्यत्र भी उद्गीथ,
प्रणव आदि नामोके द्वारा ब्रह्मका वर्णन देखा जाता है। सूक्ष्म तत्त्वमे बुद्धिका
प्रवेश करानेके लिये, किसी प्रकारकी समानताको लेकर स्थूल वस्तुके नामसे
उसका वर्णन करना उचित ही है।
सम्बन्ध—इस प्रकरणमे 'गायत्री' शब्द ब्रह्मका ही वाचक है, इस बातकी
पुष्टिके लिये दूसरी युक्ति प्रस्तुत करते हैं—
भूतादिपादव्यपदेशोपपत्तेश्चैवम् ॥ १ । १ । २६ ॥
भूतादिपादव्यपदेशोपपत्तेः=(यहाँ ब्रह्मको ही गायत्रीके नामसे कहा
गया है, यह माननेमे ही) भूत आदिको पाद बतलाना युक्तिसंगत हो सकता है,
इसलिये; च=भी; एवम्=ऐसा ही है।
व्याख्या—छान्दोग्य (३ । १२) के प्रकरणमे गायत्रीको भूत, पृथिवी, शरीर
और हृदयरूप चार पादोसे युक्त बताया गया है। फिर उसकी महिमाका वर्णन
करते हुए 'पुरुष' नामसे प्रतिपादित परब्रह्म परमात्माके साथ उसकी एकता करके
समस्त भूतोको (अर्थात् प्राणि-समुदायको) उसका एक पाद् बतलाया गया है और
अमृतस्वरूप तीन पादोको परमधाममे स्थित कहा गया है। (छा० उ० ३ ।
१२।६)। इस वर्णनकी सङ्गति तभी लग सकती है, जब कि 'गायत्री'शब्दको
गायत्री-छन्दका वाचक न मानकर परब्रह्म परमात्माका वाचक माना जाय।
इसलिये यही मानना ठीक है।
सम्बन्ध—उक्त सिद्धान्तकी पुष्टिके लिये सूत्रकार स्वयं ही शङ्का उपस्थित
करके उसका समाधान करते हैं—
वे० द० २—