Skip to content
SarvaKosh
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

Page 375 of 417

Read in context
Page 375

३५४ वेदान्त-दर्शन [ पाद
हो गयी है, उनका ब्रह्मलोकमें गमन होना सम्भव नहीं है; क्योंकि श्रुतिमें उनके
गमनका निषेध है। इस बातको दृढ़ करनेके लिये पूर्वपक्ष उपस्थित करके उसका
उत्तर दिया जाता है—
प्रतिषेधादिति चेन्न शारीरात् ॥ ४ । २ । १२ ॥
चेत्=यदि कहो; प्रतिषेधात्=प्रतिषेध होनेके कारण ( उसका गमन
नहीं होता ); इति न=तो यह ठीक नहीं; शारीरात्=क्योंकि उस प्रतिषेध-
वचनके द्वारा जीवात्मासे प्राणोंको अलग होनेका निषेध किया गया है।
व्याख्या—पूर्वपक्षकी ओरसे कहा जाता है कि 'जो कामनारहित, निष्काम,
पूर्णकाम और केवल परमात्माको ही चाहनेवाला है, उसके प्राण उत्क्रमण नहीं
करते।' ( बृह० उ० ४ । ४ । ६ ) । इस श्रुतिमें कामनारहित महापुरुषकी
गतिका अभाव बताया जानेके कारण यह सिद्ध होता है कि उसका ब्रह्मलोकमें
गमन नहीं होता, किन्तु यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि उक्त श्रुतिमें जीवात्मासे
प्राणोंके अलग होनेका निषेध है, न कि शरीरसे। अतः इससे गमनका निषेध
सिद्ध नहीं होता, अपितु जीवात्मा प्राणोंके सहित ब्रह्मलोकमें जाता है, इसी
बातकी पुष्टि होती है।
सम्बन्ध—इसके उत्तरमें सिद्धान्ती कहते हैं—
स्पष्टो ह्येकेषाम् ॥ ४ । २ । १३ ॥
एकेषाम्=एक शाखावालोंकी श्रुतिमे; स्पष्टः=स्पष्ट ही शरीरसे प्राणोंके
उत्क्रमण न होनेकी बात कही है; हि=इसलिये ( यही सिद्ध होता है कि उसका
गमन नहीं होता )।
व्याख्या—एक शाखाकी श्रुतिमें स्पष्ट ही यह बात कही गयी है कि 'न तस्य
प्राणा उत्क्रामन्ति'—'उस आप्तकाम महापुरुषके प्राण उत्क्रमग नहीं करते,
यहीं विलीन हो जाते हैं; वह ब्रह्म होकर ही ब्रह्मको प्राप्त होता है।' ( नृसिंहो० ५ )
इसके सिवा, बृहदारण्यकोपनिषद्के अगले मन्त्रमें यह भी कहा है कि
'अत्र ब्रह्म समश्नुते'—'वह यहीं ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है।' ( बृह० उ० ४ ।
४ । ७ )। दूसरी श्रुतिमें यह भी बताया गया है कि—
विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः प्राणा भूतानि संप्रतिष्ठन्ति यत्र ।
तदक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य स सर्वज्ञः सर्वमेवाविवेशेति ॥
'यह जीवात्मा समस्त प्राण, पाँचों भूत तथा अन्तःकरण और इन्द्रियोंके