ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)
Page 373 of 417
Read in context३५२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
शरीर; आ अपीतेः=मुक्तावस्था प्राप्त होनेतक रहता है, इसलिये नूतन स्थूल शरीर
प्राप्त होनेके पहले-पहले उनका परमात्मामें स्थित रहना प्रलयकालकी भाँति है ।
व्याख्या—उस प्रकरणमें जो एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जानेवालेको परम-
देवतामें स्थित होना कहा गया है, वह प्रलयकालकी भाँति कर्म-संस्कार और
सूक्ष्म शरीरके सहित अज्ञानपूर्वक स्थित होना है । अतः वह परब्रह्म परमात्माकी
प्राप्ति नहीं है; किन्तु समस्त जगत् जिस प्रकार उस परम कारण परमात्मामें
ही स्थित रहता है, उसी प्रकार स्थित होना है । यह स्थिति उस जीवात्माको
जबतक अपने कर्मफल-उपभोगके उपयुक्त कोई दूसरा शरीर नहीं मिलता, तब
तक रहती है; क्योकि उसके पुनर्जन्मका श्रुतिमें कथन है (क० उ० २ । २ । ७) ।
इसलिये जबतक उसे मुक्ति प्राप्त नहीं होती, तबतक उसका सूक्ष्म शरीरसे सम्बन्ध
रहता है; अतः वह मुक्त पुरुषकी भाँति परमात्मामे विलीन नहीं होता ।
सम्बन्ध—उस प्रकरणमें तो जीवात्माका सबके सहित आकाशादि भूतोंमें
स्थित होना बताया गया है, वहाँ यह नहीं कहा गया कि वह सूक्ष्मभूत-
समुदायमें स्थित होता है; अतः उसे स्पष्ट करते हैं—
सूक्ष्मं प्रमाणतश्च तथोपलब्धेः ॥ ४ । २ । ६ ॥
प्रमाणतः=वेद-प्रमाणसे; च=और; तथोपलब्धेः=वैसी उपलब्धि होनेसे
भी ( यही सिद्ध होता है कि ); सूक्ष्मम्=( जिसमें जीवात्मा स्थित होता है
वह ) भूतसमुदाय सूक्ष्म है ।
व्याख्या—मरणकालमें जिस आकाशादि भूतसमुदायमे सबके सहित
जीवात्माका स्थित होना कहा गया है, वह भूतसमुदाय सूक्ष्म है, स्थूल नहीं
है—यह बात श्रुतिके प्रमाणसे तो ( सिद्ध है ही ) प्रत्यक्ष उपलब्धिसे भी सिद्ध
होती है; क्योंकि श्रुतिमे जहाँ परलोक-गमनका वर्णन किया गया है, वहाँ
कहा है—
शतं चैका हृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका ।
तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वङ्ङन्या उत्क्रमणे भवन्ति ॥
'इस जीवात्माके हृदयमें एक सौ एक नाडियाँ हैं, उनमेसे एक कपालकी
ओर निकली हुई है, इसीको सुषुम्णा कहते हैं, उसके द्वारा ऊपर जाकर मनुष्य
अमृतभावको प्राप्त होता है, दूसरी नाडियाँ मरणकालमें नाना योनियोमे ले