ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)
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Read in context३४२ वेदान्त-दर्शन [ पाद १
समे शुचौ शर्करावह्नवालुका-
विवर्जिते शब्दजलाश्रयादिभिः ।
मनोऽनुकूले न तु चक्षुपीडने
गुहानिवाताश्रयणे प्रयोजयेत् ॥
‘जो सब प्रकारसे शुद्ध, समतल, कंकड़, अग्नि और बालूसे रहित तथा
शब्द, जल और आश्रयकी दृष्टिसे मनके अनुकूल हो, जहाँ आँखोंको पीड़ा
पहुँचानेवाला दृश्य न हो और वायुका झोका भी न लगता हो ऐसे गुहा आदि
स्थानमे बैठकर परमात्माके ध्यानका अभ्यास करना चाहिये।’ (श्वेता० उ०
२ । १०) इस प्रकार किसी विशेष दिशा या स्थानका निर्देश न होने तथा
मनके अनुकूल देशमे अभ्यास करनेके लिये श्रुतिकी आज्ञा प्राप्त होनेके कारण
यही सिद्ध होता है कि जहाँ सरलतासे मनकी एकाग्रता हो सके, ऐसा कोई भी
पवित्र स्थान उपासनाके लिये उपयोगी हो सकता है। अतः जो अधिक प्रयास
किये बिना प्राप्त हो सके, ऐसे निर्विघ्न और अनुकूल स्थानमे बैठकर ध्यानका
अभ्यास करते रहना चाहिये।
सम्बन्ध—इस प्रकार उपासनाका अभ्यास कबतक करना चाहिये? इस
जिज्ञासापर कहते हैं—
आ प्रायणात्तत्रापि हि दृष्टम् ॥ ४ । १ । १२ ॥
आ प्रायणात् = मरणपर्यन्त (उपासना करते रहना चाहिये); हि = क्योंकि;
तत्रापि = मरणकालमे भी; दृष्टम् = उपासना करते रहनेका विधान देखा जाता है।
व्याख्या—छान्दोग्योपनिषद्मे प्रजापतिका यह वचन है कि—‘स खल्वेवं
वर्तयन् यावदायुषं ब्रह्मलोकमभिसंपद्यते।’—‘वह इस प्रकार पूरी आयुतक
उपासनामे तत्पर रहकर अन्तमे निःसन्देह ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है।’ (छा० उ०
८ । १५ । १)। प्रश्नोपनिषद्की बात है, सत्यकामने अपने गुरु पिप्पलादसे
पूछा—‘भगवन्! मनुष्योमेसे जो मरणपर्यन्त ॐकारका ध्यान करता है, वह
किस लोकको जीत लेता है?’ (प्र० उ० ५ । १) इसपर गुरुने ॐकारकी
महिमा वर्णन करके (५ । २) दो मन्त्रोमे इस लोक और स्वर्गलोककी प्राप्तिके
उद्देश्यसे की जानेवाली उपासनाका फल बताया। (५ । ३-४) फिर अन्तमे
कहा ‘जो तीन मात्राओंवाले ॐ इस अक्षरके द्वारा इस (हृदयस्थ) परमपुरुष-