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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

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Page 321

३०० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
सम्बन्ध-इस प्रकार चार सूत्रोंद्वारा पूर्वपक्षकी उत्थापना करके अब दो
सूत्रोंमें उसका उत्तर देकर इस पादकी समाप्ति की जाती है—
न वा तत्सहभावाश्रुतेः ॥ ३ । ३ । ६५ ॥
वा=किन्तु; तत्सहभावाश्रुतेः=उन-उन उपासनाओंका समुच्चय बतानेवाली
श्रुति नहीं है, इसलिये; न= उपासनाओका समुच्चय सिद्ध नहीं हो सकता।
व्याख्या—उन-उन उपासनाओके आश्रयभूत जो उद्गीथ आदि अङ्ग हैं, उन
अङ्गोके समाहारकी भाँति उनके साथ उपासनाओका समाहार बतानेवाली कोई श्रुति
नहीं है, इसलिये यह सिद्ध नहीं हो सकता कि उन-उन आश्रयोंके समुच्चयकी
भाँति ही उपासनाओंका भी समुच्चय होना चाहिये; क्योकि उपासनाओका उद्देश्य
भिन्न है, जिस उद्देश्यसे जिस फलके लिये यज्ञादि कर्म किये जाते हैं, उनके
अङ्गोमें की जानेवाली उपासना उनसे भिन्न उद्देश्यसे की जाती है, अतः अङ्गोंके
साथ उपासनाके समुच्चयका सम्बन्ध नहीं है। इसलिये यही सिद्ध होता है
कि उपासनाओंका समुच्चय नहीं बन सकता, उनका अनुष्ठान अलग-अलग ही
करना चाहिये।
सम्बन्ध-प्रकारान्तरसे इसी सिद्धान्तको दृढ़ करते हैं—
दर्शनाच्च ॥ ३ । ३ । ६६ ॥
दर्शनात्=श्रुतिमे उपासनाओंका समाहार न करना दिखाया गया है, इसलिये;
च=भी ( उनका समाहार सिद्ध नहीं हो सकता )।
व्याख्या—श्रुतिमें कहा है कि 'पूर्वोक्त प्रकारसे रहस्यको जाननेवाला ब्रह्मा
निःसन्देह यज्ञकी, यजमानकी और अन्य ऋत्विजोकी रक्षा करता है।'
(छा० उ० ४ । १७ । १०) इस प्रकार श्रुतिमें विद्याकी महिमाका वर्णन करते
हुए यह दिखाया गया है कि इन उपासनाओंका कर्मके साथ समुच्चय नहीं होता
है; क्योकि यदि उपासनाओंका सर्वत्र समाहार होता तो दूसरे ऋत्विक् भी
उस तत्त्वके ज्ञाता होते और स्वयं ही अपनी रक्षा करते, ब्रह्माको उनकी रक्षा
करनेकी आवश्यकता नहीं पड़ती। इससे यही सिद्ध होता है कि उपासनाएँ
उनके आश्रयभूत कर्मसम्बन्धी अङ्गोके अधीन नहीं हैं, स्वतन्त्र हैं, अतएव
समुच्चय न करके उनका अनुष्ठान अलग ही करना चाहिये।
तीसरा पाद सम्पूर्ण।