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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

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सूत्र १६-१७ ] अध्याय १ ११
और अनन्त है। वह ब्रह्म विशुद्ध आकाशस्वरूप परम धाममे रहते हुए ही सब-
के हृदयरूप गुफामे छिपा हुआ है। जो उसको जानता है, वह सबको भली-
भाँति जाननेवाले ब्रह्मके साथ समस्त भोगोका अनुभव करता है।' इस मन्त्रद्वारा
वर्णित ब्रह्मको यहाँ 'मान्त्रवर्णिक' कहा गया है। जिस प्रकार उक्त मन्त्रमे उस
परब्रह्मको सबका अन्तरात्मा बताया गया है, उसी प्रकार ब्राह्मण-ग्रन्थमे 'आनन्द-
मय'को सबका अन्तरात्मा कहा है; इस प्रकार दोनो स्थलोकी एकताके लिये यही
मानना उचित है कि 'आनन्दमय' शब्द यहाँ ब्रह्मका ही वाचक है, अन्य किसी-
का नहीं।
सम्बन्ध—यदि 'आनन्दमय' शब्दको जीवात्माका वाचक मान लिया जाय
तो क्या हानि है ? इसपर कहते हैं—
नेतरोऽनुपपत्तेः ॥ १।१।१६ ॥
इतरः = ब्रह्मसे भिन्न जो जीवात्मा है, वह; न = आनन्दमय नहीं हो सकता;
अनुपपत्तेः = क्योंकि पूर्वापरके वर्णनसे यह बात सिद्ध नहीं होती।
व्याख्या—तैत्तिरीयोपनिषद्की ब्रह्मानन्दवल्लीमें आनन्दमयका वर्णन करनेके
अनन्तर यह बात कही गयी है कि 'उस आनन्दमय परमात्माने यह इच्छा की
कि मैं बहुत होऊँ; फिर उसने तप (सङ्कल्प) किया। तप करके इस समस्त
जगत्की रचना की।' (तै० उ० २। ६) यह कथन जीवात्माके लिये उपयुक्त
नहीं है; क्योकि जीवात्मा अल्पज्ञ और परिमित शक्तिवाला है; जगत्की रचना
आदि कार्य करनेकी उसमें सामर्थ्य नहीं है। अतः 'आनन्दमय' शब्द जीवात्मा-
का वाचक नहीं हो सकता।
सम्बन्ध—यही बात सिद्ध करनेके लिये दूसरा कारण बतलाते हैं—
भेदव्यपदेशाच्च ॥ १।१।१७ ॥
भेदव्यपदेशात् = जीवात्मा और परमात्माको एक दूसरेसे भिन्न बतलाया
गया है, इसलिये; च = भी ('आनन्दमय' शब्द जीवात्माका वाचक नहीं हो सकता)।
व्याख्या—उक्त वल्लीमें आगे चलकर (सातवे अनुवाकमे) कहा है कि 'यह जो
ऊपरके वर्णनमे 'सुकृत'नामसे कहा गया है, वही रसस्वरूप है। यह जीवात्मा
इस रसस्वरूप परमात्माको पाकर आनन्दयुक्त हो जाता है।' इस प्रकार यहाँ