ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)
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Read in context२९८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
इसी प्रकार उपर्युक्त विद्याओंका ब्रह्मसाक्षात्काररूप एक ही फल होनेके कारण
उनके समुच्चयकी आवश्यकता नहीं है। साधक अपनी रुचिके अनुकूल किसी
एक विद्याके अनुसार ही साधन कर सकता है।
सम्बन्ध-जो सकाम उपासनाएँ अलग-अलग फलके लिये बतायी गयी है,
उनका अनुष्ठान किस प्रकार करना चाहिये ? इस जिज्ञासापर कहते हैं—
काम्यास्तु यथाकामं समुच्चीयेरन्न वा पूर्वहेत्वभावात् ॥ ३।३।६० ॥
काम्याः=सकाम उपासनाओका अनुष्ठान; तु=तो; यथाकामम्=अपनी-
अपनी कामनाके अनुसार; समुच्चीयेरन्=समुच्चय करके किया करे; वा=
अथवा; न=समुच्चय न करके अलग-अलग करें; पूर्वहेत्वभावात्=क्योंकि इनमें
पूर्वोक्त हेतु ( फलकी समानता ) का अभाव है।
व्याख्या—सकाम उपासनाओंमें सबका एक फल नहीं बताया गया है, भिन्न-
भिन्न उपासनाका भिन्न-भिन्न फल कहा गया है, इस प्रकार पूर्वोक्त हेतु न होनेके
कारण सकाम उपासनाका अनुष्ठान अधिकारी अपनी कामनाके अनुसार जिस
प्रकार आवश्यक समझे, कर सकता है। जिन-जिन भोगोंकी कामना हो, उन-
उनके लिये बतायी हुई सब उपासनाओका समुच्चय करके भी कर सकता है
और अलग-अलग भी कर सकता है, इसमें कोई अड़चन नहीं है।
सम्बन्ध-अब उद्गीथ आदि अङ्गोंमें की जानेवाली उपासनाके विषयमें
विचार करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है। पहले चार सूत्रोंद्वारा
पूर्वपक्षकी उत्थापना की जाती है—
अङ्गेषु यथाश्रयभावः ॥ ३ । ३ । ६१ ॥
अङ्गेषु=भिन्न-भिन्न अङ्गोंमें (की जानेवाली उपासनाओंका);यथाश्रयभावः=
यथाश्रय भाव है अर्थात् जो उपासना जिस अङ्गके आश्रित है, उस अङ्गके अनुसार
ही-उस उपासनाका भी भाव समझ लेना चाहिये।
व्याख्या-यज्ञकर्मके अङ्गभूत उद्गीथ आदिमे की जानेवाली जो उपासनाएँ
है, जिनका दिग्दर्शन पचपनवें सूत्रमे किया गया है, उनमेसे जो उपासना जिस
अङ्गके आश्रित है, उस आश्रयके अनुसार ही उसकी व्यवस्था करनी चाहिये।
इसलिये यही सिद्ध होता है कि जिन-जिन कर्मोंके अङ्गोका समुच्चय हो सकता है,उन-
उन अङ्गोंमें की जानेवाली उपासनाओंका भी उन कर्मोंके साथ समुच्चय हो सकता है।