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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

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२९६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
करनी चाहिये।' (छा० उ० २ । २ । १)। इत्यादि प्रकारसे यज्ञादिके अङ्गरूप
उद्गीथ आदिसे सम्बन्ध रखनेवाली जो प्रतीकोपासना बतायी गयी है, उसका
जिस शाखामें वर्णन है, उसी शाखावालोको उसका अनुष्ठान करना चाहिये,
अन्य शाखावालोको नहीं करना चाहिये, ऐसी बात नहीं है; अपि तु प्रत्येक
वेदकी शाखाके अनुयायी उसका अनुष्ठान कर सकते हैं।
सम्बन्ध—इसी बातको उदाहरणसे स्पष्ट करते हैं—
मन्त्रादिवद्वाविरोधः ॥ ३ । ३ । ५६ ॥
वा=अथवा यो समझो कि; मन्त्रादिवत्=मन्त्र आदिकी भाँति; अविरोधः=
इसमें कोई विरोध नहीं है।
व्याख्या—जिस प्रकार एक शाखामे बताये हुए मन्त्र और यज्ञोपयोगी अन्य
पदार्थ, दूसरी शाखावाले भी आवश्यकतानुसार व्यवहारमें ला सकते हैं, उसमे
किसी प्रकारका विरोध नहीं है; उसी प्रकार पूर्वसूत्रमे कही हुई यज्ञाङ्गोंसे
सम्बन्ध रखनेवाली उपासनाओके अनुष्ठानमें भी कोई विरोध नहीं है।
सम्बन्ध—जिस प्रकार वैश्वानरविद्यामें एक-एक अङ्गकी उपासनाका वर्णन
आता है, उसी प्रकार और भी कई जगह आता है, ऐसी उपासनाओंमे उनके
एक-एक अङ्गकी अलग-अलग उपासना करनी चाहिये या सब अङ्गोंका समुच्चय
करके एक साथ सबकी उपासना करनी चाहिये ? इस जिज्ञासापर कहते हैं—
भूम्नः क्रतुवज्ज्यायस्त्वं तथा हि दर्शयति ॥ ३ । ३ । ५७ ॥
क्रतुवत्=अङ्ग-उपाङ्गसे परिपूर्ण यज्ञकी भाँति; भूम्नः=पूर्ण उपासनाकी;
ज्यायस्त्वम्=श्रेष्ठता है; हि=क्योंकि; तथा=वैसा ही कथन; दर्शयति=श्रुति
दिखलाती है।
व्याख्या—जिस प्रकार यज्ञके किसी अङ्गका अनुष्ठान करना और किसीका
न करना श्रेष्ठ नहीं है, किन्तु सर्वाङ्गपूर्ण अनुष्ठान ही श्रेष्ठ है, उसी प्रकार
वैश्वानरविद्या आदिमें बतायी हुई उपासनाका अनुष्ठान भी पूर्णरूपसे करना ही
श्रेष्ठ है; उसके एक अङ्गका नहीं। वैश्वानर-विद्याकी भाँति सभी जगह यह बात
समझ लेनी चाहिये; क्योंकि श्रुतिने वैसा ही भाव वैश्वानर-विद्याके वर्णनमे
दिखाया है। राजा अश्वपतिने प्राचीनशाल आदि छहों ऋषियोंसे अलग-
अलग पूछा कि 'तुम वैश्वानरकी किस प्रकार उपासना करते हो ?' उन्होंने अपनी-
अपनी बात कही। राजाने एक-एक करके सबको बताया—'तुम अमुक