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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

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Page 309

२८८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
साथ-साथ जो किसी-किसी प्रकरणमे ब्रह्मलोकके भोगोंकी प्राप्तिरूप दूसरे फलका
वर्णन आता है, वह भी मुख्य फलकी प्रधानता सिद्ध करनेके लिये ही है।
इसीलिये उसका सब प्रकरणोंमे वर्णन नहीं किया गया है; किन्तु उपर्युक्त मुख्य
फलका वर्णन तो सभी प्रकरणोमे आता है।
सम्बन्ध—ब्रह्मज्ञान ही इस जन्म-मृत्युरूप संसारसे छूटनेका निश्चित उपाय है,
यह बात सिद्ध करनेके लिये पूर्वपक्षकी उत्थापना की जाती है—
पूर्वविकल्पः प्रकरणात्स्यात् क्रियामानसवत् ॥ ३ । ३ । ४५ ॥
क्रियामानसवत्=शारीरिक और मानसिक क्रियाओमे स्वीकृत विकल्पकी
भाँति; पूर्वविकल्पः=पहले कही हुई अग्निविद्या भी विकल्पसे; स्यात्=मुक्तिमें हेतु
हो सकती है; प्रकरणात्=यह बात प्रकरणसे सिद्ध होती है।
व्याख्या—नचिकेताके प्रश्न और यमराजके उत्तरविषयक प्रकरणकी
आलोचना करनेसे यही सिद्ध होता है कि जिस प्रकार उपासनासम्बन्धी
शारीरिक क्रियाकी भाँति मानसिक क्रिया भी फल देनेमे समर्थ है, अतः अधिकारि-
भेदसे जो फल शारीरिक क्रिया करनेवालेको मिलता है, वही मानसिक क्रिया
करनेवालेको भी मिल जाता है; उसी प्रकार अग्निहोत्ररूप कर्म भी ब्रह्मविद्याकी
ही भाँति मुक्तिका हेतु हो सकता है। उक्त प्रकरणमे नचिकेताने प्रश्न करते
समय यमराजसे यह बात कही है कि 'स्वर्गलोकमें किञ्चिन्मात्र भय नहीं है,
वहाँ न तो आपका डर है और न बुढ़ापेका ही, भूख और प्यास—इनसे पार
होकर यह जीव शोकसे रहित हुआ स्वर्गमें प्रसन्न होता है, उस स्वर्गके देनेवाले
अग्निहोत्ररूप कर्मके रहस्यको आप जानते हैं, वह मुझे बताइये' इत्यादि (क० उ०
१। १। १२-१३)। इसपर यमराजने वह अग्निहोत्र-क्रियासम्बन्धी सब
रहस्य नचिकेताको समझा दिया ( १। १। १५)। फिर उस अग्निहोत्ररूप
कर्मकी स्तुति करते हुए यमराजने कहा है कि 'इस अग्निहोत्रका तीन बार
अनुष्ठान करनेवाला जन्म-मृत्युसे तर जाता है और अत्यन्त शान्तिको प्राप्त हो
जाता है।' इत्यादि ( १। १। १७-१८)। इस प्रकरणको देखते हुए इस
अग्निहोत्ररूप कर्मको मुक्तिका कारण माननेमें कोई आपत्ति मालूम नहीं होती।
जिस प्रकार इसके पीछे कही हुई ब्रह्मविद्या मुक्तिमें हेतु है, वैसे ही उसके पहले
कहा हुआ यह अग्निहोत्ररूप कर्म भी मुक्तिमे हेतु माना जा सकता है।