ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)
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Read in contextसूत्र १२-१३ ] अध्याय १ ९
अभ्यासात् = श्रुतिने वारंवार 'आनन्द' शब्दका ब्रह्मके लिये प्रयोग होनेके
कारण; आनन्दमयः = 'आनन्दमय' शब्द (यहाँ परब्रह्म परमेश्वरका ही वाचक है)।
व्याख्या—किसी बातको दृढ़ करनेके लिये वारंवार दुहरानेको 'अभ्यास'
कहते हैं। तैत्तिरीय तथा बृहदारण्यक आदि अनेक उपनिषदोंमे 'आनन्द' शब्द-
का ब्रह्मके अर्थमे वारंवार प्रयोग हुआ है; जैसे—तैत्तिरीयोपनिषद्की ब्रह्मवल्लीके
छठे अनुवाकमे 'आनन्दमय' का वर्णन आरम्भ करके सातवे अनुवाकमे उसके
लिये 'रसो वै सः। रसꣳह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति। को ह्येवान्यात् कः प्राण्याद्
यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्। एष ह्येवानन्दयाति' (२।७) अर्थात् 'वह
आनन्दमय ही रसस्वरूप है, यह जीवात्मा इस रसस्वरूप परमात्माको पाकर आनन्द-
युक्त हो जाता है। यदि वह आकाशकी भाँति परिपूर्ण आनन्दस्वरूप परमात्मा
नहीं होता तो कौन जीवित रह सकता, कौन प्राणोंकी क्रिया कर सकता !
सचमुच यह परमात्मा ही सबको आनन्द प्रदान करता है।' ऐसा कहा गया है।
तथा 'सैषाऽऽनन्दस्य मीमाꣳसा भवति,' 'एतमानन्दमयमात्मानमुपसंक्रामति।' (तै०
उ० २।८) 'आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कुतश्चन।' (तै० उ० २।९)
'आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्' (तै० उ० ३।६) 'विज्ञानमानन्दं ब्रह्म' (बृह०
उ० ३।९।२८)—इत्यादि प्रकारसे श्रुतियोंमें जगह-जगह परब्रह्मके अर्थमें 'आनन्द'
एवं 'आनन्दमय' शब्दका प्रयोग हुआ है। इसलिये 'आनन्दमय' नामसे यहाँ
उस सर्वशक्तिमान्, समस्त जगत्के परम कारण, सर्वनियन्ता, सर्वव्यापी, सबके
आत्मस्वरूप परब्रह्म परमेश्वरका ही वर्णन है, अन्य किसीका नहीं।
सम्बन्ध—यहाँ यह शङ्का होती है कि 'आनन्दमय' शब्दमे जो 'मयट्'
प्रत्यय है, वह विकार अर्थका बोधक है और परब्रह्म परमात्मा निर्विकार है।
अतः जिस प्रकार अन्नमय आदि शब्द ब्रह्मके वाचक नहीं हैं, वैसे ही, उन्हीं-
के साथ आया हुआ यह 'आनन्दमय' शब्द भी परब्रह्मका वाचक नहीं होना
चाहिये। इसपर कहते हैं—
विकारशब्दान्नेति चेन्न प्राचुर्यात् ॥ १। १। १३ ॥
चेत्=यदि कहो; विकारशब्दात्=मयट् प्रत्यय विकारका बोधक होनेसे;
न=आनन्दमय शब्द ब्रह्मका वाचक नहीं हो सकता, इति=तो यह कथन; न=