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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

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सूत्र ८-११ ] अध्याय १ ७
इस प्रसङ्गमे जिस सत्‌को समस्त जगत्‌का कारण बताया है, उसीमे
जीवात्माका विलीन होना कहा गया है और उस सत्‌को उसका स्वस्वरूप बताया
गया है । अतः यहाँ 'सत्' नामसे कहा हुआ जगत्‌का कारण जडतत्त्व नहीं
हो सकता ।
सम्बन्ध—यही बात प्रकारान्तरसे पुनः सिद्ध करते हैं—
गतिसामान्यात् ॥ १।१।१० ॥
गतिसामान्यात्=सभी उपनिषद्-वाक्योका प्रवाह समानरूपसे चेतनको ही
जगत्‌का कारण बतानेमे है, इसलिये ( जड प्रकृतिको जगत्‌का कारण नहीं माना
जा सकता ) ।
व्याख्या—'तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः' ( तै० उ० २ । १ )
'निश्चय ही सर्वत्र प्रसिद्ध इस परमात्मासे आकाश उत्पन्न हुआ ।' 'आत्मत
एवेदं सर्वम्' ( छा० उ० ७ । २६ । १ )—'परमात्मासे ही यह सब कुछ
उत्पन्न हुआ है।' 'आत्मन एष प्राणो जायते' ( प्र० उ० ३ । ३ )—'परमात्मासे
यह प्राण उत्पन्न होता है।' 'एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च । खं
वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी।' ( मु० उ० २ । १ । ३ )—'इस
परमेश्वरसे प्राण उत्पन्न होता है; तथा मन ( अन्तःकरण ), समस्त इन्द्रियाँ,
आकाश, वायु, तेज, जल और सम्पूर्ण प्राणियोको धारण करनेवाली पृथिवी—ये
सब उत्पन्न होते हैं।' इस प्रकार सभी उपनिषद्-वाक्योंमे समानरूपसे चेतन
परमात्माको ही जगत्‌का कारण बताया गया है; इसलिये जड प्रकृतिको जगत्‌का
कारण नहीं माना जा सकता ।
सम्बन्ध—पुनः श्रुति-प्रमाणसे इसी बातको दृढ करते हुए इस प्रकरणको
समाप्त करते हैं—
श्रुतत्वाच्च ॥ १।१।११ ॥
श्रुतत्वात्=श्रुतियोद्वारा जगह-जगह यही बात कही गयी है, इसलिये; च=
भी ( परब्रह्म परमेश्वर ही जगत्‌का कारण सिद्ध होता है ) ।
होनेकी बात कही गयी है। विलीन होनेवाली वस्तुसे लयका अधिष्ठान भिन्न होता है, अतः
यहाँ लीन होनेवाली वस्तु जीवात्मा है और जिसमे वह लीन होता है, वह परमात्मा है। इसलिये
यहाँ परमात्माको ही 'सत्' के नामसे जगत्‌का कारण बताया गया है, यही मानना ठीक है।