ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)
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Read in context२२८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
भोगना पड़ता। तथा पूर्वपक्षीने जो यह बात कही थी कि किसी-किसी शाखा-
वाले लोग पुरुषको पुत्र-पौत्रादि काम्य-विषयोंकी रचना करनेवाला बताते हैं,
वह ठीक नहीं है; क्योंकि वहाँ स्वप्नावस्थाका प्रकरण नहीं है और उस
मन्त्रमें जीवात्माको काम्य-विषयोंका निर्माता नहीं कहा गया है, वहाँ यह
विशेषण परमात्माके लिये आया है।
सम्बन्ध—इससे तो यह सिद्ध होता है कि स्वप्न सर्वथा व्यर्थ है, उसकी
कोई सार्थकता नहीं है, इसपर कहते हैं—
सूचकश्च हि श्रुतेराचक्षते च तद्विदः ॥ ३ । २ । ४ ॥
सूचकः = स्वप्न भविष्यमें होनेवाले शुभाशुभ परिणामका सूचक; च = भी
होता है; हि = क्योंकि; श्रुतेः = श्रुतिसे यह सिद्ध होता है; च = और; तद्विदः =
स्वप्नविषयक शास्त्रको जाननेवाले भी; आचक्षते = ऐसी बात कहते हैं।
व्याख्या—श्रुति (छा० उ० ५ । २ । ९) मे कहा है—
यदा कर्मसु काम्येषु स्त्रियं स्वप्नेषु पश्यति ।
समृद्धिं तत्र जानीयात्तस्मिन् स्वप्ननिदर्शने ॥
'जब काम्य कर्मोंके प्रसङ्गमें स्वप्नोंके दृश्योंमें स्त्रीको देखे तो ऐसे स्वप्न
देखनेका परिणाम यह समझना चाहिये कि उस किये जानेवाले काम्यकर्ममें
भलीभाँति अभ्युदय होनेवाला है।' तथा यह भी कहा है कि 'यदि स्वप्नमे काले
दाँतवाले काले पुरुषको देखे तो वह मृत्युका सूचक है।' (ऐतरेय आरण्यक
३ । २ । ४ । १७) इत्यादि, श्रुतिके प्रमाणोंसे यह सिद्ध होता है कि स्वप्न
सर्वथा व्यर्थ नहीं है, वह वर्तमानके आगामी परिणामका सूचक भी होता है।
इसके सिवा, जो स्वप्नविज्ञानको जाननेवाले विद्वान् हैं, वे भी इसी प्रकार स्वप्नमे
देखे हुए दृश्योंको भविष्यमें होनेवाली शुभाशुभ घटनाओंके सूचक बताते हैं।
इससे यह भी सिद्ध होता है कि स्वप्नकी घटना जीवात्माकी स्वतन्त्र रचना नहीं
है, वह तो निमित्तमात्र है; वास्तवमें सब कुछ जीवके कर्मानुसार उस परमेश्वरकी
शक्तिसे ही होता है।
सम्बन्ध—जीवात्मा भी तो ईश्वरका ही अंश है, अतः इसमें ईश्वरके ज्ञान
और ऐश्वर्य आदि गुण भी आंशिक रूपसे होंगे ही। फिर यदि ऐसा मान लें कि
स्वप्नकी सृष्टि जीवात्मा स्वयं करता है तो क्या हानि है ? इसपर कहते हैं—