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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

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दूसरा पाद
पहले पादमें देहान्तरप्राप्तिके प्रसङ्गमें पञ्चाग्निविद्याके प्रकरणपर विचार करते
हुए जीवको बारंबार प्राप्त होनेवाले जन्म-मृत्युरूप दुःखका वर्णन किया गया।
इस वर्णनका गूढ़ अभिप्राय यही है कि जीवके मनमें सांसारिक पदार्थों तथा अपने
नश्वर शरीरके प्रति आसक्ति कम हो और निरन्तर वैराग्यकी भावना बढ़े। अब,
दूसरे पादमें वर्तमान शरीरकी भिन्न-भिन्न अवस्थाओंपर विचार करके इस जन्म-
मरणरूप संसार-बन्धनसे छूटनेके लिये परमेश्वरका ध्यानरूप उपाय बताना है;
अतएव पहले स्वप्नावस्थापर विचार आरम्भ करते हुए दो सूत्रोंमें पूर्वपक्षकी उत्थापना
की जाती है—
सन्ध्ये सृष्टिराह हि ॥ ३ । २ । १ ॥
सन्ध्ये=स्वप्नमे भी जाग्रत्की भाँति; सृष्टि:=सांसारिक पदार्थोंकी रचना
होती है; हि=क्योंकि; आह=श्रुति ऐसा वर्णन करती है।
व्याख्या—बृहदारण्यकोपनिषद्मे यह वर्णन आया है कि 'स्वप्नावस्थामे यह
जीवात्मा इस लोक और परलोक दोनोंको देखता है, वहाँ दुःख और आनन्द
दोनोंका उपभोग करता है, इस स्थूल शरीरको स्वयं अचेत करके वासनामय
नये शरीरकी रचना करके, (बृह० उ० ४ । ३ । ९) जगत्को देखता है।
'उस अवस्थामे सचमुच न होते हुए भी रथ, रथको ले जानेवाले वाहन और
उसके मार्गकी तथा आनन्द, मोद, प्रमोदकी एवं कुण्ड, सरोवर और नदियोंकी
रचना कर लेता है।' (बृह० उ० ४ । ३ । १०)* इत्यादि ।
इसी प्रकार दूसरी श्रुतियोमे भी स्वप्नमें सृष्टिका होना कहा है (प्र० उ० ४ । ५;
बृह० उ० २ । १ । १८)। इसलिये यह सिद्ध होता है कि स्वप्नमें भी सांसारिक
पदार्थोंकी रचना होती है और वह अत्यन्त विचित्र तथा जीवकृत है।
निर्मातारं चैके पुत्रादयश्च ॥ ३ । २ । २ ॥
च=तथा; एके=एक शाखावाले; निर्मातारम्=पुरुषको कामनाओंका

  • 'न तत्र रथा न रथयोगा न पन्थानो भवन्त्यथ रथान् रथयोगान् पथः
    सृजते न तत्रानन्दा मुदः प्रमुदो भवन्त्यथानन्दान् मुदः प्रमुदः सृजते······वेशान्तान्
    पुष्करिणीः स्रवन्तीः सृजते।'