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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

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Page 234

सूत्र ४-५ ] अध्याय ३ २१३
व्याख्या-यदि कहो, "बृहदारण्यकके आर्तभाग और याज्ञवल्क्यके संवादमें
यह वर्णन आया है कि 'मरणकालमें वाणी अग्निमें विलीन हो जाती है,
प्राण वायुमें विलीन हो जाते हैं'--इत्यादि ( बृह० उ० ३ । २ । १३ )
इससे यह कहना सिद्ध नहीं होता कि जीवात्मा दूसरे तत्त्वोंके सहित जाता है,
क्योंकि वे सब तो अपने-अपने कारणमे यहीं विलीन हो जाते हैं।" तो ऐसी
बात नहीं है, क्योंकि यह बात आर्तभागने प्रश्नमे तो कही है, पर याज्ञवल्क्यने
उत्तरमे इसे स्वीकार नहीं किया, बल्कि सभासे अलग ले जाकर उसे गुप्तरूपसे
वही पाँच आहुतियोंवाली बात समझाकर अन्तमे कहा कि 'मनुष्य पुण्यकर्मोंसे
पुण्यशील होता है और पापकर्मोंसे पापी होता है।' छान्दोग्यके प्रकरणमे भी
बादमे यही बात कही गयी है, इसलिये वर्णनमे कोई भेद नहीं है। वह श्रुति
प्रश्नविषयक होनेसे गौण है, उत्तरकी बात ही ठीक है। उत्तर इसलिये गुप्त रक्खा
गया कि सभाके बीचमे गर्भाधानका वर्णन करना कुछ सङ्कोचकी बात है; सभामे
तो स्त्री-बालक सभी सुनते हैं।
सम्बन्ध-पुनः विरोध उपस्थित करके उसका निराकरण करते हैं-
प्रथमेऽश्रवणादिति चेन्न ता एव ह्युपपत्तेः ॥ ३ । १ । ५ ॥
चेत्=यदि कहा जाय कि; प्रथमे=प्रथम आहुतिके वर्णनमें; अश्रव-
णात्=( जलका नाम ) नहीं सुना गया है, इसलिये ( अन्तमें यह कहना कि
पाँचवीं आहुतिमें जल पुरुष नामवाला हो जाता है, विरुद्ध है ); इति न=तो ऐसी
बात नहीं है; हि=क्योंकि; उपपत्तेः=पूर्वापरकी सङ्गतिसे ( यही सिद्ध होता है
कि ); ताः एव=( वहाँ ) श्रद्धाके नामसे उस जलका ही कथन है।
व्याख्या-यदि कहो कि पहले-पहल श्रद्धाको हवनीय द्रव्यका रूप दिया
गया है, अतः उसीके परिणाम सब हैं; इस स्थितिमें यह कहना कि पाँचवीं
आहुतिमें जल ही पुरुष नामवाला हो जाता है, विरुद्ध प्रतीत होता है तो ऐसी बात
नहीं है; क्योंकि वहाँ श्रद्धाके नामसे सङ्कल्पमें स्थित जल आदि समस्त सूक्ष्म-
तत्त्वोंका ग्रहण है और अन्तमें भी उसीको जल नामसे कहा गया है, इसलिये
कोई विरोध नहीं है । भाव यह कि जीवात्माकी गति उसके अन्तिम सङ्कल्पानुसार
होती है और वह प्राणके द्वारा ही होती है तथा श्रुतिमे प्राणको जलमय बताया
है, अतः सङ्कल्पके अनुसार जो सूक्ष्म तत्त्वोंका समुदाय प्राणमे स्थित होता