ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)
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Read in context२ वेदान्त-दर्शन [ पाद १
भाव यह है कि देवता, दैत्य, दानव, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि अनेक जीवो-
से परिपूर्ण, सूर्य, चन्द्रमा, तारा तथा नाना लोक-लोकान्तरोसे सम्पन्न इस अनन्त
ब्रह्माण्डका कर्ता-हर्ता कोई अवश्य है, यह हरेक मनुष्यकी समझमे आ सकता है;
वही ब्रह्म है। उसीको परमेश्वर, परमात्मा और भगवान् आदि विविध नामोसे कहते
हैं; क्योकि वह सबका आदि, सबसे बड़ा, सर्वाधार, सर्वज्ञ, सर्वेश्वर, सर्वव्यापी
और सर्वरूप है। यह दृश्यमान जगत् उसकी अपार शक्तिके किसी एक अंशका
दिग्दर्शनमात्र है।
शङ्का—उपनिषदोमे तो ब्रह्मका वर्णन करते हुए उसे अकर्ता, अभोक्ता,
असङ्ग, अव्यक्त, अगोचर, अचिन्त्य, निर्गुण, निरञ्जन तथा निर्विशेष बताया गया
है और इस सूत्रमें उसे जगत्की उत्पत्ति, स्थिति एवं प्रलयका कर्ता बताया गया
है। यह विपरीत बात कैसे ?
समाधान—उपनिषदोमे वर्णित परब्रह्म परमेश्वर इस सम्पूर्ण जगत्का कर्ता
होते हुए भी अकर्ता है (गीता ४। १३)। अतः उसका कर्तापन साधारण
जीवोकी भाँति नहीं है; सर्वथा अलौकिक है। वह सर्वशक्तिमान्* एवं सर्वरूप
होनेमे समर्थ होकर भी सबसे सर्वथा अतीत और असङ्ग है। सर्वगुणसम्पन्न होते
हुए भी निर्गुण है† तथा समस्त विशेषणोसे युक्त होकर भी निर्विशेष‡ है। इस
- परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च । ( श्वेता० ६ । ८ )
'इस परमेश्वरकी ज्ञान, बल और क्रियारूप स्वाभाविक दिव्य शक्ति नाना प्रकारकी
ही सुनी जाती है।'
† एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा ।
कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च ॥ ( श्वेता० ६ । ११ )
'वह एक देव ही सब प्राणियोमे छिपा हुआ, सर्वव्यापी और समस्त प्राणियोका
अन्तर्यामी परमात्मा है; वही सबके कर्मोंका अधिष्ठाता, सम्पूर्ण भूतोका निवास-स्थान,
सबका साक्षी, चेतनस्वरूप, सर्वथा विशुद्ध और गुणातीत है।'
‡ एष सर्वेश्वर एष सर्वज्ञ एषोऽन्तर्याम्येष योनिः सर्वस्य प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम्॥
( मा० उ० ६ )
'यह सबका ईश्वर है, यह सर्वज्ञ है, यह सबका अन्तर्यामी है, यह सम्पूर्ण जगत्का
कारण है; क्योकि समस्त प्राणियोकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका स्थान यही है।'
नान्तःप्रज्ञं न बहिष्प्रज्ञं नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघनं न प्रज्ञं नाप्रज्ञम् । अदृष्टमव्य-