ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)
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Read in context१९४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
हुए भी प्रलयकालमे एक नहीं हो जाते, उनका विभाग विद्यमान रहता है
(ब्र० सू० २ । ३ । ३०) वैसे ही सृष्टिकालमे शरीरोके सम्बन्धसे सब जीवोकी
परस्पर व्याप्ति न होनेके कारण उनके कर्मोंका मिश्रण नहीं होता, विभाग बना
रहता है; क्योकि शरीर, अन्तःकरण और अनादि कर्मसंस्कार आदिके सम्बन्धसे
उनकी व्यापकता परमेश्वरकी भाँति नहीं है, किन्तु सीमित है, अतएव जिस प्रकार
शब्दमात्रकी आकाशमे व्याप्ति होते हुए भी प्रत्येक शब्दका परस्पर मिश्रण नहीं
होता, उनकी भिन्नता बनी रहती है तभी तो एक ही कालमे भिन्न-भिन्न देशोंमें
बोले हुए शब्दोको भिन्न-भिन्न स्थानोमे भिन्न-भिन्न मनुष्य रेडियोंद्वारा अलग-अलग
सुन सकते हैं, इसमे कोई अड़चन नहीं आती । उन शब्दोका विभुत्व और
अमिश्रण दोनों रह सकते है, वैसे ही आत्माओका भी विभुत्व उनके अमिश्रणमे
बाधक नहीं है; क्योकि आत्मतत्त्व तो शब्दकी अपेक्षा अत्यन्त सूक्ष्म है, उसके
विभु होते हुए परस्पर मिश्रण न होनेमे तो कहना ही क्या है !'
सम्बन्ध—यहाँतक जीवात्मा परमात्माका अंश है तथा वह नित्य और विभु
है, इस सिद्धान्तका श्रुति-स्मृतियोंके प्रमाणसे और युक्तियोंद्वारा भी भलीभाँति
प्रतिपादन किया गया तथा अंशांशिभावके कारण अभेदप्रतिपादक श्रुतियोंकी
भी सार्थकता सिद्ध की गयी । अब जो लोग जीवात्माका स्वरूप अन्य प्रकारसे
मानते हैं, उनकी वह मान्यता ठीक नहीं है; इस बातको सिद्ध करनेके लिये
अगला प्रकरण आरम्भ करते हैं—
आभासा एव च ॥ २ । ३ । ५० ॥
च=इसके सिवा; (अन्य प्रकारकी मान्यताके समर्थनमे दिये जानेवाले युक्ति-
प्रमाण) आभासाः=आभासमात्र; एव=ही है ।
व्याख्या—जो लोग जीवात्माको उस परब्रह्मका अंश नहीं मानते, सब जीवो-
को अलग-अलग स्वतन्त्र मानते हैं, उन्होंने अपनी मान्यताको सिद्ध करनेके लिये
जो युक्ति-प्रमाण दिये हैं, वे सब-के-सब आभासमात्र है; अतः उनका कथन ठीक
नहीं है । जीवात्माओको परमात्माका अंश मानना ही युक्तिसङ्गत है; क्योकि ऐसा
माननेपर ही समस्त श्रुतियोंके वर्णनकी एकवाक्यता हो सकती है ।
सम्बन्ध—परब्रह्म परमेश्वरको श्रुतिमें अखण्ड और अवयवरहित बताया
गया है, इसलिये उसका अंश नहीं हो सकता । फिर भी जो जीवोंको उस