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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

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Page 211

१९० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
सिद्ध होते हैं; क्योंकि अथर्ववेदकी शाखावालोके ब्रह्मसूक्तमें यह पाठ है कि
'ब्रह्म दाशा ब्रह्म दासा ब्रह्मैवेमे कितवाः' अर्थात् 'ये केवट ब्रह्म हैं, दास ब्रह्म हैं तथा
ये जुआरी भी ब्रह्म ही है ।' इस प्रकार जीवोंके बहुत्व और ब्रह्मरूपताका भी
वर्णन होनेसे यही सिद्ध होता है कि जीव ईश्वरके अंश हैं। यदि जीवोंको
परमेश्वरका अंश न मानकर सर्वथा भिन्न तत्त्व माना जाय तो जो पूर्वोक्त श्रुतियोंमें
ब्रह्मको जगत्का एकमात्र कारण कहा गया है और उन दाश, कितवोंको ब्रह्म
कहा गया है, उस कथनमें विरोध आयेगा, इसलिये सर्वथा भिन्न तत्त्व नहीं माना
जा सकता । इसलिये अंश मानना ही युक्तिसंगत है, किन्तु जिस प्रकार
साकार वस्तुके टुकड़ोंको उसका अंश कहा जाता है, वैसे भी जीवोंको
ईश्वरका अंश नहीं कहा जा सकता; क्योंकि अवयवरहित अखण्ड
परमेश्वरके खण्ड नहीं हो सकते । अतएव कार्यकारणभावसे ही जीवोंको
परमेश्वरका अंश मानना उचित है । तथा वह कार्यकारणभाव भी इसी रूपमें है
कि प्रलयकालमें अव्यक्तरूपसे परब्रह्म परमेश्वरमें विलीन रहनेवाले नित्य
और चेतन जीव सृष्टिकालमें उसी परमेश्वरसे प्रकट हो जाते हैं और पुनः
संहारके समय उन्हींमें उन जीवोंका लय होता है तथा उनके शरीरोंकी उत्पत्ति
भी उस ब्रह्मसे ही होती है ।
यह बात श्रीमद्भगवद्गीतामें इस प्रकार स्पष्ट की गयी है—
मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम् ।
संभवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः संभवन्ति याः ।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥
'हे अर्जुन ! मेरी महत् ब्रह्मरूप प्रकृति अर्थात् त्रिगुणमयी माया सम्पूर्ण
भूतोंकी योनि है अर्थात् गर्भाधानका स्थान है और मैं उस योनिमें चेतनरूप
बीजंको स्थापित करता हूँ, उस जड-चेतनके संयोगसे सब भूतोंकी उत्पत्ति होती
है । तथा हे अर्जुन ! नाना प्रकारकी सब योनियोंमें जितनी मूर्तियाँ अर्थात् शरीर
उत्पन्न होते हैं, उन सबकी त्रिगुणमयी मेरी प्रकृति तो गर्भको धारण करनेवाली माता
है और मैं बीजको स्थापित करनेवाला पिता हूँ ।' ( गी० १४ । ३-४ )
इसलिये पिता और सन्तानकी भाँति जीवोंको ईश्वरका अंश मानना ही
शास्त्रके कथनानुसार ठीक मालूम होता है और ऐसा होनेसे जीव तथा ब्रह्मका अभेद
कहनेवाली श्रुतियोंकी भी सार्थकता हो जाती है ।