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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

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सूत्र ३२] अध्याय २ १८१
कल्पना करनी पड़ेगी (ऐसी दशामें अन्तःकरणका सम्बन्ध मानना ही युक्ति-
सङ्गत है)।
व्याख्या-यदि यह नहीं माना जाय कि यह जीवात्मा अन्तःकरणके सम्बन्ध-
से समस्त वस्तुओका अनुभव करता है तो प्रत्यक्षमे जो यह देखा जाता है कि यह
जीवात्मा कभी किसी वस्तुका अनुभव करता है और कभी नहीं करता, इसकी
सिद्धि नहीं होगी; क्योकि इसको यदि प्रकाशस्वरूप होनेके कारण स्वतः अनुभव
करनेवाला मानेंगे, तब तो इसे सदैव एक साथ प्रत्येक वस्तुका ज्ञान रहता है,
ऐसा मानना पड़ेगा। यदि इसमे जाननेकी शक्ति स्वाभाविक नहीं मानेगे तो कभी
नहीं जाननेका प्रसङ्ग आ जायगा। अथवा दोनोंमेंसे किसी एककी शक्तिका
नियमन (सङ्कोच) मानना पड़ेगा। अर्थात् या तो यह स्वीकार करना पड़ेगा कि
किसी निमित्तसे जीवात्माकी ग्राहकशक्तिका प्रतिबन्ध होता है या यह मानना
पड़ेगा कि विषयकी ग्राह्यता-शक्तिमें किसी कारणवश प्रतिबन्ध आ जाता है।
प्रतिबन्ध हट जानेपर विषयकी उपलब्धि होती है और उसके रहनेपर विषयो-
पलब्धि नहीं होती। परन्तु यह गौरवपूर्ण कल्पना करनेकी अपेक्षा अन्तःकरणके
सम्बन्धको स्वीकार कर लेनेमें ही लाघव है। इसलिये यही मानना ठीक है कि
अन्तःकरणके सम्बन्धसे ही जीवात्माको समस्त लौकिक पदार्थोंका अनुभव होता
है। 'मनसा ह्येव पश्यति मनसा शृणोति' (बृह० उ० १ । ५ । ३) अर्थात्
'मनसे ही देखता है, मनसे सुनता है' इत्यादि मन्त्र-वाक्योंद्वारा श्रुति भी अन्तः-
करणके सम्बन्धको स्वीकार करती है। जीवात्माका अन्तःकरणसे सम्बन्ध रहते
हुए भी वह कभी तो कार्यरूपमें प्रकट रहता है और कभी कारणरूपसे अप्रकट
रहता है। इस प्रकार यहाँतक यह बात सिद्ध हो गयी कि जीवात्माको जो अणु
कहा गया है, वह उसकी सूक्ष्मताका बोधक है, न कि एकदेशिता (छोटेपन) का;
और उसको जो अङ्गुष्ठमात्र कहा गया है, वह मनुष्य-शरीरके हृदयके मापके अनुसार
कहा गया है तथा उसे जो छोटे आकारवाला बताया गया है, वह भी सङ्कीर्ण
अन्तःकरणके सम्बन्धसे है, वास्तवमें वह विभु (समस्त जड पदार्थोंमें
व्याप्त) और अनन्त (देश-कालकी सीमासे अतीत) है।
सम्बन्ध-सांख्यमतमें जड प्रकृतिको स्वतन्त्र कर्ता माना गया है और
पुरुषको असङ्ग माना गया है; किन्तु जड प्रकृतिको स्वभावसे कर्ता मानना युक्ति-
सङ्गत नहीं है तथा पुरुष असङ्ग होनेसे उसको भी कर्ता मानना नहीं बन