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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

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Page 199

१७८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
जीवात्माके विषयमे भी समझना चाहिये। वास्तवमें वह अणु नहीं, विभु है; इसमें
कोई शङ्का नहीं है।
पूर्वपक्षीने जो छान्दोग्य-श्रुतिका प्रमाण देकर यह बात कही कि 'वह एक
जगह स्थित रहते हुए ही नखसे लोमतक व्याप्त है', वह कहना सर्वथा प्रकरण-
विरुद्ध है; क्योंकि उस प्रकरणमें आत्माके गुणकी व्याप्तिविषयक कोई बात ही
नहीं कही गयी है। तथा गन्ध, प्रदीप आदिका दृष्टान्त देकर जो गुणके द्वारा
आत्माके चैतन्यकी व्याप्ति बतायी है, वह भी युक्तिसङ्गत नहीं है; क्योंकि श्रुतिमे
आत्माको चैतन्यगुणविशिष्ट नहीं माना गया है, बल्कि परमेश्वरकी भाँति सत्, चेतन
और आनन्द—ये उसके स्वरूपभूत लक्षण माने गये हैं। अतः जीवात्माको अणु
मानना किसी प्रकार भी उचित नहीं है।
सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि यदि इस प्रकार बुद्धि आदिके
गुणोंके संयोगसे आत्माको अङ्गुष्ठमात्र तथा एकदेशी माना जायगा, स्वरूपसे
नहीं, तब तो जब प्रलयकालमें आत्माके साथ बुद्धि आदिका सम्बन्ध नहीं
रहेगा, उस समय समस्त जीवोंकी मुक्ति हो जायगी। अतः प्रलयके बाद सृष्टि
भी नहीं हो सकेगी। यदि मुक्त जीवोंका पुनः उत्पन्न होना मान लिया जाय तो
मुक्तिके अभावका प्रसङ्ग उपस्थित होगा, इसपर कहते हैं—
यावदात्मभावित्वाच्च न दोषस्तद्दर्शनात् ॥ २ । ३ । ३० ॥
यावदात्मभावित्वात् = जबतक स्थूल, सूक्ष्म या कारण—इनमेंसे किसी भी
शरीरके साथ जीवात्माका सम्बन्ध रहता है, तबतक वह उस शरीरके अनुरूप,
एकदेशी-सा रहता है, इसलिये; च=भी; दोषः=उक्त दोष; न=नहीं है;
तद्दर्शनात् = श्रुतिमे भी ऐसा ही देखा गया है।
व्याख्या—श्रुतिमें कहा गया है कि जीवका एक शरीरसे दूसरेमे जाते समय भी
सूक्ष्म शरीरसे सम्बन्ध बना रहता है (प्र० उ० ३ । ९, १०)। परलोकमें भी उसका
शरीरसे सम्बन्ध माना गया है तथा सुषुप्ति और स्वप्नकालमें भी देहके साथ उसका
सम्बन्ध बताया गया है (प्र० उ० ४ । २, ५)। * इसी प्रकार प्रलयकालमें भी

  • तस्मै स होवाच । यथा गार्ग्य मरीचयोऽर्कस्यास्तं गच्छतः सर्वा एतस्मिंस्तेजो-
    मण्डल एकीभवन्ति ताः पुनः पुनरुदयतः प्रचरन्त्येवं ह वै तत्सर्वं परे देवे मनस्येकी-
    भवति। तेन तर्ह्येष पुरुषो न शृणोति न पश्यति न जिघ्रति न रसयते न स्पृशते
    नाभिवदते नादत्ते नानन्दयते न विसृजते नेयायते स्वपितीत्याचक्षते ।'