ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)
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Read in contextसूत्र २३—२६ ] अध्याय २ १७५
चेत्=यदि कहो; अवस्थितिवैशेष्यात्=चन्दन और आत्माकी स्थितिमें
भेद है, इसलिये ( चन्दनका दृष्टान्त उपयुक्त नहीं है ); इति न=तो यह बात
नहीं है; हि=क्योंकि; हृदि=हृदय-देशमे; अध्युपगमात्=उसकी स्थिति स्वीकार
की गयी है।
व्याख्या—यदि कहो कि चन्दनकी स्थिति तो एक देशमे प्रत्यक्ष है; किन्तु
उसके समान आत्माकी स्थिति शरीरके एक देशमे प्रत्यक्ष नहीं है, इसलिये यह
दृष्टान्त उपयुक्त नहीं है। तो यह कहना ठीक नहीं; क्योकि श्रुतिने आत्माको
हृदयमें स्थित बताकर उसकी एक देशमे स्थिति स्पष्ट स्वीकार की है। जैसे
'हृद्येष आत्मा' 'यह आत्मा हृदयमे स्थित है।' ( प्र० उ० ३ । ६ ) तथा 'कतम
आत्मेति योऽयं विज्ञानमय प्राणेषु हृद्यन्तर्ज्योतिः पुरुषः'—'आत्मा कौन है,' ऐसा
पूछनेपर कहा है कि 'प्राणोंमें हृदयके अन्दर जो यह विज्ञानमय ज्योति स्वरूप
पुरुष है।' ( बृह० उ० ४ । ३ । ७ ) इत्यादि ।
सम्बन्ध—उसी बातको प्रकारान्तरसे कहते हैं—
गुणाद्वा लोकवत् ॥ २ । ३ । २५ ॥
वा=अथवा यह समझो कि अणुपरिमाणवाले जीवात्माका; गुणात्=
चेतनतारूप गुणसे समस्त शरीरको चेतनायुक्त कर देना सम्भव है; लोकवत्=क्योकि
लोकमे ऐसा देखा जाता है।
व्याख्या—अथवा जिस प्रकार लोकमे यह बात प्रत्यक्ष देखी जाती है कि
घरके किसी एक देशमें रक्खा हुआ दीपक अपने प्रकाशरूप गुणसे समस्त घरको
प्रकाशित कर देता है, वैसे ही शरीरके एक देशमे स्थित अणु मापवाला जीवात्मा
अपने चेतनतारूप गुणके द्वारा समस्त शरीरको चेतनायुक्त कर देता है; अतः
इसमें कोई विरोध नहीं है ।
सम्बन्ध—गुण अपने गुणीसे अलग कैसे होता है ? इसपर कहते हैं—
व्यतिरेको गन्धवत् ॥ २ । ३ । २६ ॥
गन्धवत्=गन्धकी भाँति; व्यतिरेकः=गुणका गुणीसे अलग होना बन
सकता है (अतः कोई विरोध नहीं है)।
व्याख्या—यहाँ यह शङ्का भी नहीं करनी चाहिये कि गुण तो गुणीके साथ