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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

Page 187 of 417

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Page 187

१६६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
व्याख्या—तेज-तत्त्व वायुसे उत्पन्न हुआ, यही मानना चाहिये; क्योंकि यही
बात श्रुतिमें दूसरी जगह कही गयी है। भाव यह है कि उस ब्रह्मने वायुसे तेज-
की रचना की अर्थात् आकाश और वायुको पहले उत्पन्न करके उसके बाद वायुसे
तेजकी उत्पत्ति की; ऐसा माननेपर दोनों श्रुतियोंकी एकवाक्यता हो जायगी।
सम्बन्ध—इसी प्रकार—
आपः ॥ २ । ३ । ११ ॥
आपः = जल ( तेजसे उत्पन्न हुआ )।
व्याख्या—उपर्युक्त प्रकारसे दोनों श्रुतियोंके कथनकी एकता होनेसे उक्त
तेजसे जल उत्पन्न हुआ, यह समझना चाहिये।
सम्बन्ध—इस प्रकरणमें यह कहा गया है कि उस जलने अन्नको रचा,
अतः यहाँ गेहूँ, जौ आदि अन्नकी उत्पत्ति जलसे हुई या पृथिवीसे ? इस
जिज्ञासापर कहते हैं—
पृथिव्यधिकाररूपशब्दान्तरेभ्यः ॥ २ । ३ । १२ ॥
पृथिवी=( इस प्रकरणमें अन्नके नामसे ) पृथिवी ही कही गयी है;
अधिकाररूपशब्दान्तरेभ्यः=क्योंकि पाँचों तत्त्वोंकी उत्पत्तिका प्रकरण है, उसमें
बताया हुआ काला रूप भी पृथिवीका ही माना गया है तथा दूसरी श्रुतिमें भी
जलसे पृथिवीकी ही उत्पत्ति बतायी गयी है।
व्याख्या—इस प्रकरणमें अन्न शब्द पृथिवीका ही बोधक है, ऐसा समझना
ठीक है; क्योंकि यह तत्त्वोंकी उत्पत्तिका प्रकरण है तथा जो अन्नका रूप काला
बताया गया है, वह भी अन्नका रूप नहीं है, पृथिवीका ही रूप काला माना गया
है। इसके सिवा, तैत्तिरीयोपनिषद्मे जहाँ इस क्रमका वर्णन है, वहाँ भी जलसे
पृथिवीका उत्पन्न होना बताया गया है, उसके बाद पृथिवीसे ओषधि और
ओषधिसे अन्नकी उत्पत्तिका वर्णन है* । इसलिये यहाँ सीधे जलसे ही
अन्नकी उत्पत्ति मानना ठीक नहीं है। छान्दोग्यके उक्त प्रकरणमें जो यह बात
कही गयी है कि 'यत्र क्व च वर्षति तदेव भूयिष्ठमन्नं भवति ।' ( ६ । २ । ४ )
अर्थात् 'जहाँ-कहीं जल अधिक बरसता है, वहीं अन्नकी उत्पत्ति अधिक होती
है।' इसका भी यही भाव है कि जलके सम्बन्धसे पृथिवीमें पहले ओषधि अर्थात्

  • देखिये पृष्ठ १६२ की टिप्पणी ।