ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)
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Read in context१६४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
(छा० उ० ६ । १ । १ से ६ तक) उन सबकी विरोधरहित सिद्धि आकाशको
ब्रह्मके कार्यसे अलग न माननेपर ही हो सकती है, अन्यथा नहीं; क्योंकि वहाँ
मिट्टी और सुवर्ण आदिका दृष्टान्त देकर उनके किसी एक कार्यके ज्ञानसे कारणके
ज्ञानद्वारा सबका ज्ञान होना बताया है । अतः यदि आकाशको ब्रह्मका कार्य
न मानकर ब्रह्मसे अलग मानेंगे तो कारणरूप ब्रह्मको जान लेनेपर भी आकाश
जाना हुआ नहीं होगा; इससे प्रतिज्ञाकी हानि होगी । इतना ही नहीं, 'यह सब
ब्रह्म ही है' (मु० उ० २ । २ । ११) 'यह सब इस ब्रह्मका स्वरूप है' (छा०
उ० ६ । ८ । ७) 'यह सब निःसन्देह ब्रह्म ही है; क्योंकि उत्पत्ति, स्थिति और
प्रलय उसीमे होते हैं' (छा० उ० ३ । १४ । १) इत्यादि श्रुतिवाक्योसे भी यही
सिद्ध होता है कि आकाश उस ब्रह्मका ही कार्य है ।
यावद्विकारं तु विभागो लोकवत् ॥ २ । ३ । ७ ॥
तु=तथा; लोकवत्=साधारण लौकिक व्यवहारकी भाँति; यावद्विकारम्=
विकारमात्र सब कुछ; विभागः=ब्रह्मका ही विभाग (कार्य) है ।
व्याख्या-जिस प्रकार लोकमे यह बात देखी जाती है कि कोई पुरुष
देवदत्तके पुत्रोका परिचय देते समय कहता है—'ये सब-के-सब देवदत्तके पुत्र
हैं।' फिर वह उनमेसे किसी एक या दोका ही नाम लेकर यदि कहे कि 'इनकी
उत्पत्ति देवदत्तसे हुई है' तो भी उन सबकी उत्पत्ति देवदत्तसे ही मानी जायगी,
उसी प्रकार जब समस्त विकारात्मक जगत्को उस ब्रह्मका कार्य बता दिया गया,
तब आकाश उससे अलग कैसे रह सकता है । अतः तेज आदिकी सृष्टि बताते
समय यदि आकाशका नाम छूट गया तो भी यही सिद्ध होता है कि आकाश भी
अन्य तत्त्वोंकी भाँति ब्रह्मका कार्य है और वह उससे उत्पन्न होता है । वायु और
आकाशको अमृत कहनेका तात्पर्य देवताओंकी भाँति उन्हें अन्यकी अपेक्षा
चिरस्थायी बतानामात्र है ।
सम्बन्ध—इस प्रकार आकाशका उत्पन्न होना सिद्ध करके उसीके उदाहरणसे
यह निश्चय किया जाता है कि वायु भी उत्पन्न होता है—
एतेन मातरिश्वा व्याख्यातः ॥ २ । ३ । ८ ॥