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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

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Page 177

१५६ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
अधिष्ठानानुपपत्तेः=अधिष्ठानकी उपपत्ति न होनेके कारण; च=भी
( ईश्वरको केवल निमित्त कारण मानना उचित नहीं है ) ।
व्याख्या—उनकी मान्यताके अनुसार जैसे कुम्भकार मृत्तिका आदि साधन-
सामग्रीका अधिष्ठाता होकर घट आदि कार्य करता है, उसी प्रकार सृष्टिकर्ता
ईश्वर भी प्रधान आदि साधनोंका अधिष्ठाता होकर ही सृष्टिकार्य कर सकेगा;
परन्तु न तो ईश्वर ही कुम्भकारकी भाँति सशरीर है और न प्रधान ही मिट्टी
आदिकी भाँति साकार है; अतः रूपादिसे रहित प्रधान निराकार ईश्वरका अधिष्ठेय
कैसे हो सकता है? इसलिये ईश्वरको केवल निमित्त कारण माननेवाला पाशुपतमत
युक्तिविरुद्ध होनेके कारण मान्य नहीं है।
सम्बन्ध—यदि ऐसी बात है तो ईश्वरको शरीर और इन्द्रियोंसे युक्त क्यों न
मान लिया जाय ? इसपर कहते हैं—
करणवच्चेन्न भोगादिभ्यः ॥ २ । २ । ४० ॥
चेत्=यदि; करणवत्=ईश्वरको शरीर, इन्द्रिय आदि करणोंसे युक्त मान
लिया जाय; न=तो यह ठीक नहीं है; भोगादिभ्यः=क्योंकि भोग आदिसे
उसका सम्बन्ध सिद्ध हो जायगा।
व्याख्या—यदि यह मान लिया जाय कि ईश्वर अपने सङ्कल्पसे ही मन, बुद्धि
और इन्द्रिय आदिसहित शरीर धारण करके लौकिक दृष्टान्तके अनुसार निमित्त
कारण बन जाता है, तो यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि शरीरधारी होनेपर साधारण
जीवोंकी भाँति उसे कर्मानुसार भोगोंकी प्राप्ति होनेका प्रसङ्ग आ जायगा। उस
दशामें उसकी ईश्वरता ही सिद्ध नहीं होगी। अतः ईश्वरको केवल निमित्त कारण
मानना युक्तिसंगत नहीं है।
सम्बन्ध—उपर्युक्त पाशुपतमतमें अन्य दोषोंकी उद्भावना करते हुए
कहते हैं—
अन्तवत्त्वमसर्वज्ञता वा ॥ २ । २ । ४१ ॥
अन्तवत्त्वम्=( पाशुपतमतमे ) ईश्वरके सान्त होनेका; वा=अथवा;
असर्वज्ञता=सर्वज्ञ न होनेका दोष उपस्थित होता है।
व्याख्या—पाशुपतसिद्धान्तके अनुसार ईश्वर अनन्त एवं सर्वज्ञ है। साथ