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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

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१५० वेदान्त-दर्शन [ पाद २
बाजीगरद्वारा उपस्थित किये जानेवाले पदार्थ यद्यपि सत्य नहीं होते तो भी
इनकी उपलब्धि देखी जाती है; इसपर कहते हैं—
वैधर्म्याच्च न स्वप्नादिवत् ॥ २ । २ । २९ ॥
वैधर्म्यात् = जाग्रत् अवस्थासे अन्य अवस्थाओके धर्ममे भेद होनेके कारण;
च=भी; ( जाग्रत्मे उपलब्ध होनेवाले पदार्थ ) स्वप्नादिवत्=स्वप्नादिमें उपलब्ध
पदार्थोंकी भाँति; न=मिथ्या नहीं हैं।
व्याख्या—स्वप्नावस्थामे प्रतीत होनेवाले पदार्थ पहलेके देखे, सुने और
अनुभव किये हुए ही होते है तथा वे जगनेपर उपलब्ध नहीं होते। एकके
स्वप्नकी घटना दूसरेको नहीं दीखती। उसी प्रकार बाजीगरद्वारा कल्पित पदार्थ
भी थोड़ी देरके बाद नहीं उपलब्ध होते। मरुभूमिकी तप्त बालुकाराशिमें प्रतीत
होनेवाले जल, सीपमे दीखनेवाली चाँदी तथा भ्रमवश प्रतीत होनेवाली दूसरी
किसी वस्तुकी भी सत्तारूपसे उपलब्धि नहीं होती है। परन्तु जो जाग्रत्-कालमे
प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाली वस्तुएँ हैं, उनके विषयमे ऐसी बात नहीं है। वे एक ही
समय बहुतोंको समान रूपसे उपलब्ध होती है, कालान्तरमे भी उनकी उपलब्धि
देखी जाती है। एक प्रकारका आकार नष्ट कर दिया जानेपर भी दूसरे आकारमें
उनकी सत्ता विद्यमान रहती है। इस प्रकार स्वप्नादिमें भ्रान्तिसे प्रतीत होनेवाले
पदार्थोंके और सत्पदार्थोंके धर्मोंमें बहुत अन्तर है। इसलिये स्वप्नादिके दृष्टान्तके
बलपर यह कहना उपयुक्त नहीं है कि 'उपलब्धिमात्रसे पदार्थकी सत्ता सिद्ध
नहीं होती।'
सम्बन्ध—विज्ञानवादी ऐसा कहते हैं कि बाह्य पदार्थ न होनेपर भी पूर्व-
वासनाके कारण बुद्धिद्वारा उन विचित्र पदार्थोंका उपलब्ध होना सम्भव है; अतः
इसका खण्डन करते हैं—
न भावोऽनुपलब्धेः ॥ २ । २ । ३० ॥
भावः=विज्ञानवादियोद्वारा कल्पित वासनाकी सत्ता; न=सिद्ध नहीं होती;
अनुपलब्धेः=क्योंकि उनके मतके अनुसार बाह्य पदार्थोंकी उपलब्धि ही
नहीं हो सकती।
व्याख्या—जो वस्तु पहले उपलब्ध हो चुकी है, उसीके संस्कार बुद्धिमे
जमते हैं और वे ही वासनारूपसे स्फुरित होते हैं। पदार्थोंकी सत्ता स्वीकार न